बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। वोटर लिस्ट को दुरुस्त करने के अभियान के तहत अब तक लगभग 35 लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। यह निर्णय ऐसे समय में लिया गया है जब राज्य में राजनीतिक माहौल गर्म है और सभी पार्टियां चुनावी रणनीति में जुटी हैं।
इस बदलाव की मुख्य वजह यह है कि कई मतदाता अब जीवित नहीं हैं, कुछ बिहार से स्थायी रूप से बाहर जा चुके हैं, और कुछ के नाम एक से अधिक बार वोटर लिस्ट में दर्ज हैं। इन गलतियों को सही करने के लिए चुनाव आयोग ने SIR (Special Intensive Revision) नाम से एक अभियान शुरू किया है।
- कौन-कौन हटेगा वोटर लिस्ट से? आंकड़े खुद कर रहे हैं खुलासा
- आंकड़ों के अनुसार, कुल 12.5 लाख मृत लोगों के नाम वोटर लिस्ट में बतौर मतदाता अंकित हैं, उन्हें चिन्हित किया गया है।
- ऐसे नामों की कुल संख्या देखी जाए तो वह कुल वोटर्स का तकरीबन 1.59% है।
- 17.5 लाख लोग बिहार से स्थायी रूप से बाहर। यहां वोट डालने के पात्र नहीं।
- 5.5 लाख वोटर्स के नाम लिस्ट में दो बार दर्ज।
- इस पूरी प्रक्रिया के तहत कुल 35.5 लाख नाम हटाए जाएंगे, जो कि कुल मतदाताओं का 4.5% से भी अधिक है। यह एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है, खासकर चुनाव के इतने करीब।
- विदेशी नागरिक भी थे वोटर लिस्ट में शामिल, अब हटाए जा रहे हैं
- चुनाव आयोग की जांच में यह भी पाया गया कि कुछ विदेशी नागरिक, जो नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार जैसे देशों से आए हैं, ग़लती से वोटर लिस्ट में शामिल हो गए थे। यह न केवल सुरक्षा की दृष्टि से गंभीर मामला है, बल्कि चुनाव की पारदर्शिता पर भी सवाल उठाता है।
- अब आयोग ने इन सभी विदेशी नामों को वोटर लिस्ट से हटाने का निर्देश दिया है। यह कदम यह सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है कि केवल वैध भारतीय नागरिक ही बिहार चुनाव में मतदान कर सकें।
SIR के ज़रिए हो रही है वोटर लिस्ट की कड़ाई से जांच
चुनाव आयोग का स्पष्ट कहना है कि वे चाहते हैं कि 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची 100% शुद्ध हो। उनका उद्देश्य है कि फर्जी वोटिंग पर पूरी तरह लगाम लगाई जाए और लोकतंत्र की नींव को मजबूत किया जाए।
विपक्ष ने खड़ा किया सवाल, चुनाव परिणामों पर असर का जताया अंदेशा
इस पूरी प्रक्रिया को लेकर विपक्ष की चिंताएं भी कम नहीं हैं। राजद नेता तेजस्वी यादव ने पहले ही इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया दी थी। उनका कहना था कि यदि हर विधानसभा क्षेत्र से 1% मतदाताओं के नाम हटाए जाते हैं, तो प्रत्येक क्षेत्र में औसतन 3,200 नाम गायब हो सकते हैं। लेकिन अब जब यह प्रतिशत 5% से भी ऊपर चला गया है, तो चिंता और भी बढ़ गई है।
तेजस्वी यादव और अन्य विपक्षी नेताओं का कहना है कि इस वोटर डिलिशन प्रक्रिया से चुनाव के नतीजे प्रभावित हो सकते हैं। वे मांग कर रहे हैं कि चुनाव आयोग इस पर पारदर्शिता बरते और सभी हटाए गए नामों की सार्वजनिक रूप से समीक्षा हो।
फॉर्म जमा करने की अंतिम तिथि 25 जुलाई, फिर जारी होगा पहला ड्राफ्ट
अब तक 6.6 करोड़ मतदाताओं ने अपने फॉर्म जमा कर दिए हैं, जो कुल मतदाताओं का 88.18% हिस्सा हैं। 25 जुलाई 2025 तक मतदाता अपना फॉर्म जमा कर सकते हैं। इसके बाद, चुनाव आयोग द्वारा वोटर लिस्ट का पहला मसौदा जारी किया जाएगा, जिसे आम जनता के सुझावों और आपत्तियों के लिए खोला जाएगा।
क्या यह पहल लोकतंत्र को मजबूत करेगी या राजनीतिक बहस को जन्म देगी?
एक तरफ चुनाव आयोग इस पूरी कवायद को चुनाव की शुद्धता और पारदर्शिता को बनाए रखने की दिशा में जरूरी बता रहा है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष इसे राजनीतिक चाल करार दे रहा है। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या यह प्रक्रिया निष्पक्ष ढंग से लागू की जा रही है या फिर इससे कुछ खास वर्गों को चुनावी लाभ दिलाने की कोशिश की जा रही है।
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