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पटना: बिहार की शिक्षा व्यवस्था को समझने के लिए एक नजर उसके अतीत पर डालना जरूरी है। 2005 से पहले राज्य की शैक्षणिक स्थिति चिंताजनक थी। खासतौर पर लड़कियों की शिक्षा लगभग उपेक्षित थी। उस वक्त महिला साक्षरता दर महज 33.57 प्रतिशत थी, और स्कूलों की हालत बेहद जर्जर। लेकिन 2005 में जैसे ही नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद की कमान संभाली, शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई—खासतौर पर बालिकाओं की शिक्षा को एक अभियान का रूप दिया गया।

नीतीश सरकार की सोच और बेटियों पर विशेष ध्यान
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शुरुआत से यह स्पष्ट कर दिया कि राज्य में सामाजिक बदलाव की नींव केवल शिक्षा से ही रखी जा सकती है। उन्होंने कहा, “जब तक हमारी बेटियां पढ़ाई में आगे नहीं आएंगी, तब तक हम एक प्रगतिशील समाज की कल्पना नहीं कर सकते।” इसी सोच के तहत मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना, ड्रेस योजना, छात्रवृत्ति, और मिड डे मील योजना जैसे कई क्रांतिकारी कार्यक्रम शुरू किए गए। इन योजनाओं ने लड़कियों को स्कूल तक लाने और उन्हें पढ़ाई में बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाई।

इसका असर भी साफ दिखा। 2025 तक आते-आते बिहार की महिला साक्षरता दर बढ़कर 73.91 प्रतिशत हो गई है। यह न केवल एक सांख्यिकीय उपलब्धि है, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की एक मजबूत कहानी भी कहती है।

स्कूलों की संख्या और शिक्षकों में जबरदस्त इजाफा
2005 से पहले बिहार में केवल 53,993 स्कूल थे, जो अब बढ़कर 75,812 हो चुके हैं। यह केवल संख्या नहीं, बल्कि राज्य के हर कोने तक शिक्षा पहुंचाने का प्रतीक है। इसी तरह, पहले 2.25 लाख शिक्षक थे, जो अब 5.97 लाख से भी अधिक हो गए हैं। यह विस्तार न केवल शिक्षा की पहुंच को गहराई देता है, बल्कि पढ़ाई की गुणवत्ता में भी सुधार लाता है।

विद्यालय भवनों और मूलभूत सुविधाओं में व्यापक सुधार
2005 से पहले अधिकतर स्कूलों में जर्जर इमारतें, अस्वच्छ शौचालय, पेयजल की कमी और बैठने की खराब व्यवस्था जैसी समस्याएं आम थीं। लेकिन अब 75 प्रतिशत से अधिक विद्यालयों में पक्के और सुरक्षित भवन, स्वच्छ शौचालय, पेयजल सुविधा और पर्याप्त बैठने की व्यवस्था मौजूद है। यह परिवर्तन न सिर्फ छात्रों के लिए सुरक्षित माहौल देता है, बल्कि अभिभावकों के मन में भी विश्वास जगाता है।

तकनीकी शिक्षा और डिजिटल इंडिया का समावेश
बिहार की शिक्षा अब सिर्फ किताबों और ब्लैकबोर्ड तक सीमित नहीं है। स्मार्ट क्लास, डिजिटल कक्षाएं, और ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से छात्रों को वीडियो लेक्चर्स, ऑनलाइन टेस्ट और वर्चुअल क्लासरूम का अनुभव मिल रहा है। इससे उनकी सीखने की क्षमता बढ़ी है और पढ़ाई में रुचि भी।

तकनीकी संस्थानों की बात करें तो, 2005 में राज्य में केवल 2 इंजीनियरिंग कॉलेज, 13 पॉलिटेक्निक, और 23 आईटीआई थे। आज ये आंकड़े बदल चुके हैं—अब 38 इंजीनियरिंग कॉलेज, 46 पॉलिटेक्निक, और 152 आईटीआई संस्थान राज्यभर में सक्रिय हैं। इससे युवाओं को तकनीकी शिक्षा पाने और बेहतर रोजगार के अवसर प्राप्त करने का रास्ता खुला है।

उच्च शिक्षा को नई ऊंचाई
उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी नीतीश सरकार ने व्यापक विस्तार किया है। जहां पहले सिर्फ 10 राज्य विश्वविद्यालय थे, अब उनकी संख्या 21 हो चुकी है। इसके अलावा, IIT पटना, IIM बोधगया, NIFT पटना, और IIIT भागलपुर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों की स्थापना से बिहार का शैक्षणिक परिदृश्य राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से उभरा है।

शिक्षा बजट में ऐतिहासिक वृद्धि
2005 में जहां बिहार का शिक्षा बजट मात्र ₹4,366 करोड़ था, वहीं अब यह आंकड़ा ₹77,690 करोड़ के पार जा चुका है। यह वित्तीय प्रतिबद्धता राज्य सरकार की प्राथमिकता और दूरदर्शिता को दर्शाती है। ये बजट न केवल संरचना, बल्कि गुणवत्ता और समावेशन पर भी केंद्रित है।

हर तबके तक पहुंची शिक्षा की किरण
राज्य सरकार ने ऐसी योजनाएं लागू कीं, जो समाज के अंतिम व्यक्ति तक शिक्षा पहुंचाने में सफल रहीं। छात्रवृत्ति योजनाएं, मिड डे मील, और बालिकाओं के लिए विशेष प्रोत्साहन कार्यक्रमों ने वंचित और कमजोर तबकों को भी शिक्षित करने का रास्ता खोला। स्कूल छोड़ने वाले छात्रों की संख्या में भारी कमी आई है, खासकर लड़कियों में ड्रॉपआउट रेट में बड़ा सुधार हुआ है।

यह परिवर्तन सिर्फ आंकड़ों की कहानी नहीं है, यह उन लाखों बेटियों और युवाओं की प्रेरणादायक यात्रा है, जिन्होंने शिक्षा को अपनी ताकत बनाया और पूरे बिहार को एक नई दिशा दी।