अवधी फाग गीतों की कार्यशाला ने चार से चाँद

अवधी फाग गीतों की कार्यशाला ने चार से चाँद

लखनऊ – फागुन में फाग गाने का चलन बसंत पंचमी से आठौ अर्थात राधाष्टमी तक है पूरे अवध प्रांत में बड़ी धूमधाम से फाग गाया जाता है जिसमें लोग पूरी मण्डली के साथ फाग गाते हैं अवध में घर-घर दरवाजे पर पहुँच कर मंडली फाग गाती है और लोग एक-दूसरे को अबीर गुलाल लगाकर गले मिलते हैं । लोकरंग फाउंडेशन और अवध भारती संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में फाग गीतों की कार्यशाला 21 मार्च से प्राग नारायण रोड पर कल्याण भवन के सामने जोशी क्लासेज के ऑडिटोरियम में चल रही है कार्यशाला में गोंडा से आये पं शिवपूजन शुक्ल और लखनऊ से लोकगायिका कुसुम वर्मा फाग गीत सिखा रहे हैं ।

कार्यशाला का उद्घाटन श्री अशोक बनर्जी और डाॅ राम बहादुर मिसिर ने माँ सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण करके किया था , उन्होंने फाग गीतों के रस और विविधता, ताल और कलाकारों के बारे में बताया ।अब तक जो गीत सिखाया गये उसमें- “सदा आनंद रहे यही द्वारा मोहना “मोरी भीगे चुनर भीगे अंगिया रंग डारो न डारो ….पिया पतिया लिखै घरवाली मोरी गोदिया होरिल बिन खाली …बाज रही पूजनीय छपा छम आदि गीत, चौताल सिखाया । कार्यशाला 26 मार्च तक चलेगी और 27 मार्च को मंच प्रस्तुति होगी । तीसरे दिन की कार्यशाला का शुभारम्भ कला वसुधा की संपादक एवं भातखण्डे की प्रो ऊषा बनर्जी ने किया । श्रीमती बनर्जी ने अवधी लोक साहित्य में फाग गीतों के लालित्य का विवेचन करते हुए कहा कि इस कार्यशाला से इन गीतों को प्रतिष्ठा तो मिलेगी ही साथ ही नई पीढ़ी इससे जुड़ेगी ।

कार्यशाला में विश्वंभर नाथ अवस्थी तथा तमाम प्रतिभागी उपस्थित रहे। कानपुर से कल्पना सक्सेना, बाराबंकी से सरोज श्रीवास्तव, गीता शुक्ला, जया श्रीवास्तव, डाॅ प्रतिभा मिश्रा, सरिता अग्रवाल, सुधा कटियार, राकेश, सौरभ कमल आदि प्रतिभागियों ने फाग की विभिन्न विधाओं का गाकर रसास्वादन किया और माहौल को रंगीन कर दिया। प्रशिक्षक शिवपूजन शुक्ल ने चौताल और धमार की गायन शैली की बारीकियों को विस्तार से बताया । लोकरंग की सचिव कुसुम वर्मा और अवध भारती संस्थान के अध्यक्ष राम बहादुर मिसिर ने सभी प्रतिभागियों और मुख्य अतिथि के प्रति आभार व्यक्त किया ।