जमानत से छूटे हेमंत तिवारी के लिए मुश्किलों का दौर अभी खत्म नही

जमानत से छूटे हेमंत तिवारी के लिए मुश्किलों का दौर अभी खत्म नही

लखनऊ (भास्कर दुबे )। उत्तर प्रदेश पुलिस की एसटीएफ ने हेमंत तिवारी को सरकार विरोधी अनर्गल टिप्पणी करने पर नोटिस जारी करके 7 दिनों में स्पष्टीकरण मांगा है। नोटिस में साफ तौर पर उल्लेख किया गया है कि यदि 7 दिनों में स्पष्टीकरण नहीं दिया गया तो तो विधिक कार्रवाई STF द्वारा की जाएगी, यह कोई पहला मौका नहीं है जब उत्तर प्रदेश पुलिस की एसटीएफ द्वारा पत्रकार पर विधिक कार्यवाही की जाएगी। इससे पूर्व उच्च न्यायालय के आदेश पर राज भवन कॉलोनी के एक वरिष्ठ पत्रकार पर जौनपुर के बाहुबली के साथ उत्तर प्रदेश पुलिस की एसटीएफ ने मुकदमा दर्ज किया है लेकिन यहां विचारनीय प्रश्न है कि आखिर पत्रकारों पर इस तरह के मुकदमें क्यों ?

कहीं ऐसा तो नही कि पत्रकार भी अपने मूल दायित्वों का निर्वहन करने में चूक रहे है और वास्तु स्थिति पर अगर नजर डालें तो कुछ ऐसा ही हो रहा है। पत्रकार का मतलब है कि उसके द्वारा दिए गए वक्तव्य, लिखी गई खबर सत्य या सत्यता पर आधारित होनी चाहिए खबर से संबंधित सभी अभिलेख और दिए गए वक्तव्य से संबंधित सभी साक्ष्य पत्रकार के पास उपलब्ध होने चाहिए वरना खबरों की सत्यता वास्तविकता पर प्रश्नचिन्ह लगना और कानूनी कार्रवाई किया जाना अनुचित नहीं होगा।

वर्तमान परिदृश्य में STF द्वारा जिन पत्रकारों को नोटिस जारी की गई है उनमें से दो पत्रकारों के राजसी वैभव से समूची पत्रकार बिरादरी अवगत है। मुम्बई से लेकर गोआ और पैंटहाउस की मस्तियाँ सर्वविदित है । विगत कई सालों से हेमंत तिवारी का पत्रकारिता क्षेत्र से दूर-दूर तक नाता नहीं रहा है और देखा जाए तो विवादों से गहरा नाता रहा है । खबरों की वजह से कम और पत्रकारों के नेता के वजूद से अपनी पहचान बना चुके हेमंत तिवारी पत्रकारों की ट्रेड यूनियन में फूट डालो राज करो की रणनीति के कारण अपना एक नया गुट बनाकर कभी मुंबई कब श्रीलंका तो कभी बंगलुरु की यात्रा करके जिस काम मे लगे है उसके चलते हेमंत के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही और जांच जारी है। कर्नाटक के पत्रकारो के अधिवेशन में 10 लाख रुपये लेने के मामले में ट्रेड यूनियन ने अपनी बैठक में हेमंत तिवारी के विरुद्ध उचित कानूनी कार्यवाही की संस्तुति भी करी है लेकिन पुलिस प्रशासन के कुछ अधिकारियों को सत्ता का डर दिखाकर हेमंत तिवारी पुलिस की जांच से बचते रहे और उनके इसी रसूख पर माननीय उच्च न्यायालय द्वारा उन्हें हजरतगंज पुलिस स्टेशन का गॉड फादर बताया गया है।

अपनी बटवारे की राजनीति के चलते उत्तर प्रदेश में भी पत्रकारों की सियासत में हेमंत तिवारी ने महारत हासिल की हैं और खुद को पत्रकारों का मोदी कहलाते है। उसी रसूख रसूख को बनाए रखने के लिए वर्दीधारी सुरक्षाकर्मी अपने साथ ले कर चकते है, एक कलमकार को, एक पत्रकार को किन नियमों, किस कानून के अंतर्गत इतने सालों से सुरक्षाकर्मी दिया जा रहा है यह भी गहन चिंता का विषय है और लखनऊ शहर में रियायती दरों पर भूखंड लेकर भवन निर्माण करने के उपरांत भी सरकारी आवास में काबिज रहकर हेमंत तिवारी हर सरकार को खुली चुनौती देते हैं और सरकारी नुमाइंदे उन पर कार्यवाही करने से न सिर्फ घबते है बल्कि कतराते भी दिखते है।

ऐसे में उत्तर प्रदेश की एसटीएफ पुलिस इस नोटिस के उपरांत कुछ कार्यवाही भी कर पाएगी यह भी बड़ा संशय का विषय है लेकिन पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों का पालन करना हर पत्रकार का नैतिक दायित्व एवं कर्तव्य है और यदि हेमंत तिवारी के पास उत्तर प्रदेश पुलिस एसटीएफ को लेकर दिए गए बयान के संबंध में कोई भी साक्ष्य सबूत उपलब्ध है तो उसको उनके द्वारा सार्वजनिक किया जाना चाहिए जिससे पत्रकारिता की साख बची रह सके……