शेखचिल्ली भी हैरान है, काशी है न ‘क्यूटो’ ये तो वेनिस’ बना दियो

हिन्द की सरजमी गंगा-यमुना, सरस्वती की पावन भूमि, जहां जन्म मात्र से ही जीवन धन्य हो जाती है। ऐसी देव और पैगम्बरों के तपोभूमि पर हम सभी को जन्म लेने का अवसर मिला है यह हम सबके लिए गर्व की बात है। और उससे गर्व की बात यह हमारी इसी पावन धरती पर 2014 के लोकसभा के चुनाव के बाद एक ऐसी शख्सियत उभर कर जनता के सामने आई जिसकी ख्याति न सिर्फ भारत मे बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुई और ऐसी प्रसिद्धि किसी भी नेता को 70 सालों में नही मिली है।

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लोकप्रियता में मोदीजी ने 70 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया, आज घर द्वार, गांव आंगन, शहर मोहल्ले में मोदी है तो मुमकिन है का तराना चल रहा है तो ऐसे ही नही इसके पीछे अनेक ऐसे उदाहरण है जो मोदीजी को अनमोल रत्न होने की आस्था को प्रमाणित करते है, पप्पू की बातें धरातल पर रह गयी, गब्बर सिंह का अंदाज़ पीछे छूट गया, अब भूत प्रेत की कहानी सुनाई नही देती, बच्चों को सुलाने या डराने के लिए शेर, गीदड़ की बात नही होती, बात चाहे अच्छे दिन की हो या अंतरिक्ष की, चांद तारे तोड़ने की या सूरज की लालिमा लाने की, अब सब मुमकिन है क्योंकि “मोदी है तो मुमकिन है”, बच्चों से लेकर बूढ़ों तक, पति से लेकर प्रेमी तक, पुजारी से लेकर मुल्ला तक, किसान से लेकर विद्वान तक सब मोदी है तो मुमकिन है कि धारा में बह रहे है।

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मोदीजी की मन की बात, मोरों के साथ दाने की सौगात देखकर ऐसी ही एक शख्सियत का ख्याल आया गया जिसका गौरवशाली इतिहास हमारे देश में दर्ज हैं। हरियाणा के थानेसर जिले में बना मक़बरा हमे उस अनमोल रत्न, कथा नायक की याद दिला रहा है जिसकी ख्याति विश्वप्रसिद्ध रही है, क्या बच्चे, क्या बूढ़े, क्या औरते, सभी वर्ग में प्रचलित, जिनका जीवन पूरा संघर्षों से भरा पड़ा है, बच्चों सा भोलापन था तो ईमानदारी का सागर, समाज के लिए समर्पित, निष्ठावान, मर्यादित, लगन और उत्साह से लबरेज़ और इन सबसे बड़ी बात यह है कि अपने वर्तमान में जीने वाला, घुमक्कड़ी का चस्का जिसके कारण पढ़ाई से कोसो दूर और दिन भर घूम घूम कर बेसिरपैर की हरकतें करना, और इन्हीं हरकतों के चलते घर, परिवार समाज ने अकेले छोड़ दिया, लेकिन अकेले होने पर भी हिम्मत नही हारी, और इसी अकेलेपन ने कल्पनाओं को पंख लग दिए, यही से शुरू हुआ कपोल कल्पनाओं और अजीबो गरीब कारनामों का सफर। सुनने में सालों पुरानी ये गाथा बिल्कुल आज के ज़माने कि लगती है लेकिन वास्तविकता में भिन्नता भी है, नाम से लेकर स्वरूप तक सब अलग है, शेखचिल्ली का नाम लगभग हम सभी ने सुना होगा, अपने समय के बड़े सूफी संतों में से एक थे, मुगल बादशाह और औरंगजेब के बड़े भाई दारा शिकोह के आध्यात्मिक गुरु भी थे और थानेसर में उनके मकबरे का निर्माण किया गया है।

शेखचिल्ली भी हैरान है, काशी है न 'क्यूटो' ये तो वेनिस' बना दियो

शेखचिल्ली का जन्म किसी गांव में एक गरीब शेख परिवार में हुआ था। पिता बचपन में ही गुजर गए थे, मां ने पाल-पोस कर बड़ा किया। मां सोचती थी कि एक दिन बेटा बड़ा होकर कमाएगा तो गरीबी दूर होगी। लेकिन बेटे ने बड़ा काम किया हवा में महलों का निर्माण किया और उनकी कल्पना में महान व्यवसाय स्थापित किए, मनमौजी जीवन जीता हुआ शेखचिल्ली कई बार हमें मूर्ख या बेवकूफ प्रतीत होता है किन्तु उसकी अजीबो गरीब हरकतों, बातों में समय की ऐसी समझ समाई रहती है कि जनता उन्हीं बातों में खो जाती है और जब आंख खुलती है तो सब कुछ जा चुका होता है, पांच साल कब गुज़र जाते है इसका पता ही नही लगता। 2022 दिख रहा है और नए नए वादों और इरादों के साथ काशी में शर्मा जी का आगमन हो चुका है।

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जो घोषणा चुनाव से पहले सुनाई थी, जिसको सुनकर देश की जनता ने अपनी आंखों में सुनहरे स्वप्न सजाए थे, जिन आंखों में अभी रोजगार के ख्वाब थे जिन हाथों ने अभी 15 लाख गिने नहीं , जो सपने अभी पूरे हुए नहीं कि आप फिर से मन की बात लेकर सपने दिखाने आ गए, अबकी शर्मा जी को भी काशी सुधार में लगा दियो, ये तो अच्छा है आज शेखचिल्ली नही वरना ये देखकर वो भी अपना नाम बदलने की सोचता।

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मोदीजी ने सिर्फ देश को ही नही बदला अपनी पार्टी को भी बदल दिया, नेताओं की एक्सपायरी डेट योजना भी लागू की गयी, 2014 के घोषणा पत्र में जिन नेताओं की तस्वीर से एकजुटता दिखाई जा रही थी, वहीं सिर्फ और सिर्फ मोदीजी नज़र आ रहे है, मोदी है तो मुमकिन है, सही बात भी है भीड़तंत्र से अच्छे दिन नही आते, अच्छे दिन अब आएंगे, 2014 के घोषणा पत्र से जैसे 11 नेताओं की तस्वीर गायब हुई वैसे ही वादों को बिना पूरा किये 500 वादे गायब कर दिए और एक बार फिर वादों का नया पिटारा आ जाता है जिसमें कला और कल्पनाओं से नए रंग भर दिए जाते है,, लेकिन अच्छे दिन कहा चले गए इसपर एक खामोशी है।

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राम मंदिर ज़मीन के घोटाले की दास्तान हर ज़ुबान पर है, खेला हुआ है लेकिन एक नए अंदाज में खेला गया है, भ्रस्टाचार को धर्म की आड़ में छुपा दिया है, कोलकाता मे केंद्रीय बल और केंद्रीय जांच एजेंसियों से चुनावी माहौल में काम लेकर ये साबित हुआ, मोदी है तो मुमकिन है, देश के चौराहों का चहुमुखी विकास और सौन्द्रीयकरण करने के लिए दी गयी कुर्बानी को कौन भूल सकता है, नोटबन्दी के 50 दिनों में ही देशव्यापी आंदोलन ने जोर पकड़ लिया कि क्योंकि 50 दिन बाद मोदी जी चौराहों पर खड़े होंगे और अगर नोटबन्दी करने में कोई गलती हुई तो देश जो सज़ा देगा वो सज़ा भुगतने को तैयार रहेंगे, नोटबन्दी का दर्द कब आया कब चला गया, कोरोनॉ एक बड़ी मार दे गया, बिना इलाज, बिना ऑक्सीजन के आदमी तो मर गया, शमशान और कब्रिस्तान में भी अंतिम क्रिया करम के लिए इंसान तरस गया, लेकिन मन की बात में नयनो से निकले आंसू दिलों के दर्द को साफ न कर सका, शेख चिल्ली के किस्से सिर्फ अपने गप्पी कारनामों के लिए जाने गए वही मोदी जी के कदमों की आहट से विपक्षी दलों के नेताओ को चिली लगने लगती है, पप्पू बनाना तो बाएं हाथ का काम है , जब चाहा जिसको चाहा पप्पू बना दिया, सिर्फ बातें बघारने से विद्वानों की नगरी वाराणसी से कोई भारी बहुमत से अगर जीत सकता है तो वो करिश्मा भी मोदी ने मुमकिन कर दिखाया।

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उम्मीदों के सपनों से भरी काशीवासियों की आंखे हर वक्त बस अपने पीएम के वादों को अपने दिलों में बसाए उनके आने की राह में टकटकी लगाए बैठी है, उन्हें लगता है कि पीएम मोदी जरूर मंदिरों के इस शहर की खूबसूरती को निखार देंगे क्योंकि मोदी ने काशी को जापान के क्यूटो शहर की तरह बनाने की बात कही थीं। शिक्षा और मन्दिरो के लिए विश्वविख्यात काशी के निवासी सरल, सहज, विद्वान होने के कारण आज भी मोदी की ओर टकटकी लगाये बैठे हैं और ये कामना कर रहे है *मोदीजी अबकी ‘क्यूटो’ नही ‘काशी’ दीजो,* क्योंकि मोदी है तो मुमकिन है, वहीं दूसरी तरफ, काशी से कोसों दूर जापान वासी भी सेटेलाइट के ज़रिए काशी के विकास को निहार रहे हैं और इस मानसून में काशी को वेनिस बनते देख रहे है और काशी की जनता मोदी से अपनी काशी की ही मांग लगाए बैठे है।

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बेचारे शर्मा जी क्या करे, अपने ही संकटों से नही निकल पा रहे है ऐसे में काशी को क्या सुधारेंगे, अब तो खुद को बचाने की कशमकश में लगे है और यही सोचकर परेशान है काशी से अच्छा तो गुजरात था, ढोकला और फाफड़ा का नाश्ता था यहाँ की तरह कोई लफड़ा न था।