हमारा नाम और हमारी पहचान पर हमला

ठाकुरगंज इलाके के 68 वर्षीय मोहम्मद नसीम का यही कहना है ।

19 दिसंबर को वे लखनऊ के सिविल अस्पताल से दवा लेकर वापस आ रहे थे । वे पैदल परिवर्तन चौक से पहले स्थित जिमखाना क्लब के पास बनी मजार पर बैठकर आराम करने लगे। उन्होंने सड़क पर लड़कों को भागते देखा तो बेहतर समझा कि किनारे बैठें और सब शांत होने पर घर के लिए निकलें। उन्हें दाढ़ी वाला देखकर योगी कि पुलिस वालो ने नाम पूछा और नाम सुनते ही गालियों की बौछार के साथ उनकी दाढी से पकड़ कर उन्हें घसीटते हुए चौराहे तक ले गया। वहां मौजूद पत्रकारों ने भी बताया कि इन बुजुर्ग को जब पुलिस घसीट कर ला रही थी तो इनके कपड़े फट गये थे घुटनों से खून निकल रहा था । वे बार बार गुहार पानी के लिए गुहार लगाते रहे पर पूलिस ने मना कर दिया। हज़रतगंज थाने से जब उन्हें मेडिकल के लिए सिविल अस्पताल ले जाया गया तो रास्ते में पुलिस की गाड़ी में बैठे एक नौजवान ने उनकी जांघ में पेंचकस घुसा दिया जिससे वे लहूलुहान हो गये। थाने की रात एक भयानक दु:स्वपन थी जिसे वे भूल जाना चाहते हैं। उन्होंने हमसे कई बार कहा कि उन्हें अहसास होता था कि वे मर चुके हैं..उनके बेटे जरदोजी का काम करते हैं ..

19 दिसंबर को जब अब्बू वापस नहीं आये तो वे रात तक ढूंढते रहे किंतु जब पता लगा कि थाने पर पूछताछ करने वालों को भी पकड़ा जा रहा है तो थाने जाने की हिम्मत न जुटा पाये। दूसरे दिन कोर्ट गये तो वहां भयानक स्थिति थी, खदरे से पकड़ कर लाते 20 लड़कों को वकीलों का एक बड़ा ग्रुप भारत माता की जय ” बंदेमातरम के नारे लगाते हुए पीट रहा था । वे दुआ करने लगे कि उनके अब्बू यहां न लाये जायें ..

अब जब 21 दिनों के बाद उनके अब्बू जेल से घर वापस आ गये हैं तो उन्हें यह सवाल परेशान कर रहा है कि वे सब कहां जायें ??? उनका कहना था कि हम तो मोदीजी से नौकरी भी नहीं मांग रहे हैं, अपना ही छोटा-सा धंधा करते हैं तो क्या हमें दो वक्त की रोटी भी गुनाह है ??? हमारा मुल्क, हमारी मिट्टी हिंदुस्तान है हमें पाकिस्तान का ताना न दें ..

Source : Mohammad Rayyan Siddiqui Facebook