श्रीलंका स्तिथ अशोक वाटिका का भ्रमण करते भारतीय पत्रकार दल

न्यूवरो एलिया के होटल गैलवे हाईट में सुबह का नाश्ता करने के बाद हम सीथा एलिया (अशोक वनम) की ओर रवाना हुए।

भारतीय हिन्दू पौराणिक मान्यताओं के हिसाब से रावण द्वारा सीताहरण, हनुमान जी द्वारा सीता जी का पता लगाना और राम-रावण युद्ध आदि का वर्णन है, (यहां मंदिर के जो पुजारी हैं, वो श्रीलंकन नहीं बल्कि इंडियन हैं, इनके अनुसार यहां के स्थानीय लोगों में मंदिर को लेकर कोई आस्था नहीं है पर थोड़े-बहुत भारतीय यहां आते रहते हैं) परंतु स्थानीय प्रबुद्धों के हवाले से वो ऐसा कुछ भी नहीं जानते और न ही मानते हैं (मैं भी किसी प्रकार की और किसी भी धार्मिक मान्यताओं पर किसी से विवाद नहीं चाहता)।

अभी हाल में ही भारत के विभिन्न बड़े ओहदेदारों, चिंतकों, साहित्यकारों और राजनीतिज्ञों के ओर से कई बार बयानबाज़ी हुयी कि हनुमान जी कौन हैं ? यह सुनने को मिला, बड़ा ठेस लगा था। चूंकि स्पष्ट है कि मानव जाति की उत्पत्ति कपिराजों से ही है, इसलिए आज श्रीलंका के सीथा एलिया नामक स्थान जो कभी अशोक वनम (यहाँ कभी अशोक के पेड़ हुआ करते थे, पर अब नहीं हैं) के नाम से जाना जाता था, स्थित वानरराज, मानव जाति के पूर्वज अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता बाबा बजरंग बली (बिना सिंदूर वाले काले, बिल्कुल कपि रूप में) के चरणों में अपना शीश झुकाने पहुँच आया।

यहाँ एक पत्थर पर विशालकाय हनुमान जी के पदचिन्ह आज भी उनके होने का एहसास कराते हैं। जिस पत्थर पर विशालकाय पैरों के निशान हैं, वो पत्थर थोड़ा फिसलन वाला है। चूंकि वहां ऊँचे-बड़े पहाड़ों से झरने टाइप का तेज पानी का बहाव है इसलिए वहां नहीं पहुंचा जा सका। पहले यहाँ किसी मंदिर का कोई अस्तित्व नहीं था, लेकिन हनुमान जी की काले पत्थर (कपि रूप) वाली मूर्ति थी। चूंकि इस स्थान के बारे में भारतीय जनमानस की आस्था थी, जिसे देखते हुए श्रीलंकन सरकार ने टूरिज़्म और भारतीय अध्यात्म के नाते इस स्थान को सीथा एलिया नाम से सजाया-संवारा और कुछ साल पहले एक दक्षिण भारतीय उद्योगपति ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया।

चूंकि श्रीलंका में अपने मानव जाति के पूर्वज (बजरंग बली) के प्रति मेरी लालसा मात्र उनके दर्शन की थी, जो मुझे उनके वास्तविक रूप में मिली। कहते हैं कि बड़े-बुज़ुर्ग यानी पूर्वज धरती पर भगवान ही होते हैं , लिखा भी है कि – और देवता चित्त न धरईं, हनुमत सेई सर्व सुख करईं ।।

चाय-पानी के बहाने रास्ते मे एडबुला रोड के मगसथोता में ग्रेगरी लेक नाम का एक गज़ब का झील देखने को मिला। यहां शानदार बोटिंग – राफ्टिंग करने और देखने लायक है। बोट पर बने रेस्ट्रोरेंट कश्मीर की याद दिलाते हैं।

ख़ैर, थोड़ी देर आंखों को सुकून देने के बाद 250 किलोमीटर चलने का सिलसिला शुरू हुआ। वक़्त काफी हो चुका था, भूख लगना लाज़िमी था। बिल्कुल सस्ते से हिल कूल रेस्ट्रोरेंट में श्रीलंका का अब तक का सबसे बढ़िया फ्राइड राइस खाने को मिला।मौसम पानी-पानी है, कोलंबो पहुंचना है, गाड़ी चलती रहेगी क्योंकि मंजिल अभी दूर है, बस चलते जाना है ! कल फिर कुछ …