शरद का चांद सेंट्रल जेल बनारस में भी निकला था ।

 

हम डिप्टी जेलर को धकियाने के जुर्म में ‘ तनहाई ‘ भेज दिए गए थे । गर आपको जेल का अनुभव नही है तो जान लीजिए जेल में जुर्म करेंगे तो वहां अलग ही सजा मिलेगी । इसी में से एक सजा है तनहाई । बैरक लंबाई चौड़ाई के हिसाब से उस तबेले की तरह होती है जिसमे कम से कम पचास भैसे एक साथ बांधी जा सकें । तनहाई इसके उलट एक अंधेरा कमरा होता है । तीन फीट चौड़ा और तकरीबन आठ फिट लम्बा कमरा , लोहे की चादर का दरवाजा । ऊपर एक रोशनदान । तन्हाई के सर्किल में कुल सात या आठ कमरे होते हैं । जेल थोड़ी सुविधा दे दे तो यह काम करने , पढ़ने लिखने की बहुत अच्छी जगह हो सकती है । मसलन दरवाजे का खुला रहना , अटैच बाथरूम जो हर तनहाई में दीवार से सटे एक फिट की जगह में बना रहता है अगर उसे हटा कर बाहर बने ‘ खुड्डी ‘ के इस्तेमाल की सुविधा मिल जाय तो बेहतर रहता है । बहरहाल हम इसी तनहाई में चार नम्बर में थे , हमारे बगल में हरिवंश सिंह मुगल सराय वाले रहे और उनकी बगल में टटके पकड़ के आये गुजरात के मुख्यमंत्री रहे चिमन भाई पटेल रखे गए थे ।
हमे सुविधा थी कि हम बाहर खुले में सो सकें । हरिवंश हमारा प्रिय था और ख़ुत्थड ‘जेलची ‘ । दर्जा आठ से लेकर ग्रेजुएशन तक के इम्तहान उसने जेल से ही दिए हैं । यह जेल मैनुवल है । जब भी इम्तहान का समय आता ,हरिवंश जेल आ जाता । और जेल से ही पास होता । बाहर से जो अध्यापक इम्तहान लेने जेल आता वो बेचारा हांफते डांफते किसी तरह पर्चा कॉपी निकलता उसके पहले हरिवंश अध्यापक को प्रणाम करते , कुर्सी देते और हिदायत भी – आप लिखिए गुरु जी , जहां न समझ आये हम किताब देते हैं , खोज कर लिखिए , हम आपके लिए चाय लेकर आते हैं । दोपहर का भोजन शाकाहारी या मांशाहरी ? मुर्गा , मछली , मटन जो चाहिए बता दीजिए ? अंदाजा लगाइये वो बेचारा अध्यापक जो जेल के नाम पर राम राम करने लगता हो वह मटन देखे की किसी तरह जेल से जान बचे और निकल भागे । जनाब हरिवंश शिक्षित हैं । शायद पोस्ट ग्रेजुएट भी बन गए हैं जेल की कृपा से । तो तन्हाई में हम हरिवंश कोई बात पे हंस रहे थे इतने में बगल के बैरक से एक दर्द भरा गीत उठा , पूरे तरन्नुम में, सीधे सप्तम से ।
‘ पिया तू आव अंगना’
हमने जोर से चीखा – बाबा !
लालमुनि चौबे काशी विश्वविद्यालय के छात्र नेता रहे संघी थे लेकिन संघियों में अछूत थे क्यों वे समाजवादियों के अभिन्न रहे , देवव्रत मजूमदार के लँगोटिया यार , और कमबख्त यह लँगोट उनकी गिरफ्तारी का कारण बना और गंगा घाट से थाने तक पुलिस इनको इसी लिबास में लाई लेकिन वाह रे बनारस – बाबा के चेहरे पर जो ताजगी और जज्बा था, लग रहा था बाबा ससुराल जा रहे हैं हाथ मे हथकड़ी पीछे पुलिस की नख्तरबन्द गाड़ी , बनारस खड़ा देख रहा था हुकूमत की हांक । जेल से छूट कर यही बाबा सांसद रहे , बिहार में मंत्री रहे । गाते बहुत बढ़िया थे ।
आव अंगना । यह बाबा की आवाज थी जिसपर हमने जोर का हांका मारा की बाबा तक हमारी आवाज पहुंच जाए । इसी एन मौके पर तन्हाई का दरवाजा खुला और जेल अधीक्षक सियाराम मैत्रेय चिमन भाई पटेल के साथ नमूदार हुए ।
यह शरद की रात थी

(वरिष्ठ पत्रकार चंचल भू की फेसबुक वॉल से )