बदलते साल में क्यों न मान्यता समिति के चुनाव का स्वरुप बदल जाये !!

डॉ मोहम्मद कामरान

साल गुज़र रहा है, विदाई दुखदायी होती है लेकिन ये साल की विदायी अकेला ऐसा मौका होता है जो हर्षोल्ल्लास से मनाया जाता है, उत्तर प्रदेश के मीडिया के लिये 2019 काफी उतार चढ़ाव का रहा,, मीडिया के लिए नयी परिभाषा का चलन देखने को मिला वहीँ कलमकारों के लिए नौकरशाहों का आतंक भी साफ़ साफ़ दिखाई दिया। ‘फूट डालो राज करो’ की नीति 2019 में मीडिया पर भी दिखाई दी, जहाँ मान्यता और गैर मान्यता जैसे मानकों को लेकर एक लकीर खींचने का प्रयास किया गया वहीँ धर्म मज़हब के आधार पर वर्दीधारियों का आतंक भी मीडियकर्मियों पर दिखाई दिया, साल 2019 में मीडिया से जुड़े पत्रकार संगठनों की ख़ामोशी एक बड़ा सवाल बन कर उभरी है, जहाँ बड़े मीडिया संघठन अपने अपने निजी स्वार्थ में गुटबाज़ी के तहत एक दुसरे की टांग खींचने में व्यस्त रहे, हाकिमों और खादिमों के साथ तस्वीरों की नुमाइश ही इन बड़े संघठनो के पदाधिकारियों का पूरे साल मक़सद रहा हो तो पत्रकारों के उत्पीड़न जैसी मुद्दे पर उनकी ख़ामोशी देखकर अगर प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा पत्रकारों से जुड़े संगठनों के खामोश रवैये पर चिंता जताई है तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। 2019 में बच्चों को नमक रोटी दिए जाने को लेकर खबर छापने और वीडियो वायरल करने वाले पत्रकार पवन जायसवाल के गंभीर मामले को लेकर किसी पत्रकार संगठन (Press Organization) ने प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (Press Council of India) में कोई शिकायत नहीं की थी इस बात की जानकारी खुद पत्रकार मामलों से जुड़ी सर्वोच्च संस्था प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (Press Council of India) के अध्यक्ष जस्टिस चंद्रमौली कुमार प्रसाद (Justice Chandramauli Kumar Prasad) ने प्रेस कांफ्रेंस (Press Conference) कर दी है.

2020 की शुरुआत होने वाली है और साल भर पत्रकारों की समस्याओं पर कुम्भकर्णी नींद लेने वाले ऐसे पत्रकार संघठन और गुटबाज़ी के शिकार इनके पदाधिकारी किसी न किसी बहाने से साल की शुरुआत में ही आपको नौकरशाहों की चाकरी में या तो फूल मालाएं या गुलदस्ता देते नज़र आएंगे या किसी कार्यक्रम के आयोजन में खड़े होकर अपनी तस्वीरें सोशल मीडिया पर लगा कर अपने संघठन की दूकान चमकाते नज़र आएंगे और फिर कुम्भकर्णी नींद में सो जायेंगे। साल 2020 उत्तर प्रदेश के पत्रकारों के लिए महत्वपूर्ण होगा जहाँ एक बार फिर से पत्रकारों के सबसे बड़े संघठन के पदाधिकारियों का चुनाव किया जाना है, हर दो साल पर होने वाले इस चुनाव पर सभी पत्रकारों, नौकरशाहों, राजनीतिक दलों की नज़र होती है क्योंकि उत्तर प्रदेश के राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त पत्रकारों का ये चुनाव हर साल पत्रकारों के अनेक मुद्दों पर कार्य करने के लिए गठित किया जाता है लेकिन विगत वर्षों से इस मान्यता समिति पर गुटबाज़ी ऐसी हावी है की पत्रकार हितों पर चर्चा करना तो दूर, पत्रकार हितों के लिए चयनित पदाधिकारी आपस में एक साथ बैठकर बात करना पसंद ही नहीं करते, इन हालातों का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता हैं की चयनित समिति के दो वर्ष पूरे होने पर भी एक भी सदस्य इस समिति में आजतक नामित नहीं किया जा सका है और समिति की कार्यकारिणी की बैठक न तो बुलायी जाती है और न ही बुलाये जाने का कोई प्रस्ताव दिया जाता है, केवल अपने अपने गुटों के साथ कार्यक्रमों या नौकरशाहों के साथ तस्वीरों की सोशल मीडिया पर एक जंग दिखाई देती है, पत्रकार की शोक सभा के दो दो आयोजन हो जाते है, एक से बढ़कर एक घोषणाएं होती है जो सभा समाप्त होने के बाद सोशल मीडिया पर वायरल करने के उपरांत दम तोड़ देती है जिससे पत्रकार हितों का कोई लेना देना नहीं है, केबल खानापूर्ति करनी है और अपने अपने हाकिमो और खादिमों को खुश रखना ही इनकी प्राथमिकता दिखती है.

वर्ष 2019 में ऐसे चेहेर भी सामने आये है जो इस गुटबाज़ी से अलग दिखाई दे रहे है और पत्रकार हितों के लिए कार्यरत राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अनेक पदों पर 2020 में होने वाले चुनाव में अपनी अपनी दावेदारी लेकर मैदान में उतरने की तैयारी में लगे है। ऐसे ही एक व्यक्तित्व (MANOJ MISRA) जो पत्रकारों के बीच में काफी लोकप्रिय है और किसी भी गुट का लेबल नहीं पहन रखा है, मान्यता समिति के अध्यक्ष पद की दावेदारी के लिए 2020 में अपना प्रस्ताव दाखिल करेंगे। बदलते साल में क्यों न मान्यता समिति के चुनाव का स्वरुप बदला जाये. गुटबाजों को दूर किया जाये और सर्वोच्च अध्यक्ष पद की दावेदारी को सर्वमतों से सर्व सहमति से निर्विरोध, निर्बाध चयनित किया जाये।

एक नयी सोच, एक नई शुरुआत, एक नए साल 2020 के लिए आप सभी को हार्दिक शुभकामनाये !