जो देखूँगा, जो समझूंगा, वो सब साफ़ साफ लिख दूँगा

किसी के हक़ में, किसी के खिलाफ़ लिख दूँगा,

मैं तो आईना हूँ, कनपुरिया हूँ,

जो देखूँगा, जो समझूंगा, वो सब साफ़ साफ लिख दूँगा.

हिंदी पत्रकारिता दिवस के मौके पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनायें, आज के इस खास दिन पर श्यामल त्रिपाठी जी का ख़ास तौर पर शुक्रगुजार हूँ जिन्होंने आई वॉच इंडिया और लाइव इंडिया बैनर के तले देश के चौथे स्तंभ की विशेषता व निष्पक्षता बनाने हेतु प्रशस्ति पत्र हमारे गरीबखाने आकर दिया और हमारा मान सम्मान बढ़ाया, मेरा मानना यह है कि सम्मान न तो किसी से मांगा जा सकता है और न ही सम्मान कहीं जाकर लिया जा सकता है बल्कि सम्मान अर्जित किया जाता है और यह सम्मान हमें अपने कर्म और कार्यों के माध्यम से समाज में अर्जित की गई ख्याति के आधार पर मिलता है।

श्यामल जी ने अपने प्रशस्ति पत्र में हमे सम्मानित कर गौरान्वित महसूस करने की बात तो कह दी है लेकिन यह मेरे लिए ज्यादा खुशनसीबी का दिन है कि हिंदी पत्रकारिता दिवस के मौके पर श्यामल त्रिपाठी खुद चलकर हमारे गरीबखाने आये, हमारे सम्मान के लिए नही, पत्रकारिता के सम्मान के लिए और हमारे कानपुर के सम्मान के लिए।

आज ही के दिन हिंदी पत्रकारिता की बुनियाद हिंदुस्तान की सरजमीं पर जिस शख्स ने रखी थी वह हमारे अपने कनपुरिया पत्रकार थे, पंडित जुगल किशोर शुक्ला जी का ताल्लुक हमारी मातृभूमि क्रांतिकारी नगरिया कानपुर से था, जिन्होंने हमारी तरह अपनी पत्रकारिता जगत की शुरुआत एक हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र उदंत मार्तंड के नाम से 1826 में कोलकाता से की थी। जिस तरह हमने अपने पत्रकारिता के शुरुआती दौर में 500 प्रतियाँ प्रकाशित कर एक हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र लखनऊ शहर से शुरू किया था ठीक वैसे ही आज से 194 साल पहले पंडित जी ने कोलकाता से मात्र 500 प्रतियां वाले साप्ताहिक हिंदी भाषी समाचार पत्र की बुनियाद रखी थी, आज के हालात और उस वक्त के हालात में कोई बहुत भारी बदलाव नहींआया, अंग्रेज़ी शासन काल की दमनकारी नीतियों के खिलाफ सच की मशाल बुलंद करना उतना ही मुश्किल था जितना आज के दौर में सच लिखना है, लेकिन तब भी आईना दिखाने वाले पत्रकार थे और आज भी ऐसे पत्रकार मौजूद है, अपनी इन्हीं आदतों के चलते श्याद बदनाम हूँ क्योंकि हर परिस्थिति में सच के लिए लड़ने को तैयार हूँ, लेकिन शुक्रिया श्यामल जी जो इस लाकडॉन के चलते आपने पत्रकारिता दिवस के दिन को अपने प्रशस्ति पत्र के रंगों से रंग दिया। लोकतंत्र में प्रेस एक बेहद ज़रूरी स्तंभ है जिसके पास शक्ति और ज़िम्मेदारी दोनों है, ऐसे में प्रेस से जुड़े लोगों को सम्मान और सहयोग की अत्यंत आवश्यकता होती है ।।