कोरोना के चलते भण्डारे की पुरानी परंपरा का परिवेश भी बदला

हिन्दू-मुस्लिम एकता से जुडी अपने प्रदेश लखनऊ में ज्येष्ठ महीने के हर मंगल को बडा मंगल के रूप मे मनाने की परम्परा ऐसी है की पूरे हिंदुस्तान के लिए एक मिसाल है लेकिन लॉकडॉन के चलते इस बार बड़े मंगल पर भंडारे देखने को नही मिले,
आज अंतिम बड़े मंगल के दिन इस आयोजन में आईना अध्यक्ष ने लखनऊ शहर के कई भंडारों में न सिर्फ शिरकत की बल्कि प्रसाद वितरण में।योगदान भी किया–

नजम अहसन ने बताया कि कोरोना काल के चलते भण्डारे की पुरानी परंपरा का परिवेश भी इस वक़्त बदल गया है। पहले भण्डारे मे गुडधनिया (भुने हुए गेहूं मे गुड मिलाकर बनाया जाने वाला प्रसाद) बंटवाया जाता था और पीने के लिये प्याऊ लगवाये जाते थे। उसके बाद गुडधनिया के साथ चीनी का बताशा और शरबत बंटने लगा। लगभग चार सौ वर्ष पूर्व तत्कालीन मुगल शासक सुजाउददौला ने लखनऊ के अलीगंज मे स्थित पुराने हनुमान मंदिर के नाम से प्रसिद्ध मंदिर मे मनौती मानी थी और उनकी मनौती पूरी होने के पश्चात मुगल शासक ने इस पुराने हनुमान मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। सुजाउददौला द्वारा मंदिर के गुंबद का लगवाया गया प्रतीक चांद तारा का चिन्ह आज भी मंदिर के गुंबद पर चमक रहा है।

मंदिर के जीर्णोद्धार के साथ ही मुगल शासक ने उस समय ज्येष्ठ माह मे पडने वाले प्रत्येक मंगल को पूरे नगर मे गुडधनिया (भुने हुए गेहूं मे गुड मिलाकर बनाया जाने वाला प्रसाद) बंटवाया था और प्याऊ लगवाये थे। तभी से इस बडे मंगल की परंपरा की नींव पडी और आज के अंतिम भंडारे में जिस तरह इक़बाल, वाहिद, ज़ुबैर, कुदरत खान और अन्य लोगों की टीम काम करके वही 400 वर्षा पुरानी परंपरा को कायम रखे हुए है और गरीब ज़रूरतमंदों की हर संभव मदद कर रही है, वो सराहनीय है।।