कैसे कर पाता है टेलीग्राफ यह सब ?

द टेलीग्राफ खबर लिखने और शीर्षक लगाने में ही अनूठा नहीं है उसकी प्रस्तुति भी खास होती है। जब गिरफ्तारी अलग तरह की थी तो रिहाई की रिपोर्टिंग भी अलग तरह की होनी चाहिए। इस तरह के डिसप्ले के लिए निश्चित रूप से अखबार का पन्ना खाली चाहिए होता है और विज्ञापनों पर आश्रित अखबार विज्ञापन नहीं छोड़ सकते (चाहे खबर छोड़ दें)। क्या टेलीग्राफ विज्ञापन छोड़ देता है या आते नहीं हैं। और अगर आते नहीं है तो कैसे चल रहा है। इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप ने जनसत्ता को अपनी मौत मरने के लिए छोड़ दिया है पर टेलीग्राफ (जनसत्ता से पहले शुरू हुआ था) अब तक वैसा ही बना हुआ है। निश्चित रूप से यह इसके अच्छे संपादक और उनकी टीम के कारण है। लेकिन क्या मालिकानों का कोई योगदान नहीं है?

मेरे ख्याल से यह संभव ही नहीं है कि मालिकों की इच्छा के बगैर कोई अखबार और उसका संपादक इतने समय तक इतना अच्छा (मैं जानबूझकर तेवरदार नहीं लिख रहा, वह अलग हिम्मत की बात है) अखबार निकाले। विज्ञापनों के लिए लार न टपकाए। द टेलीग्राफ अगर इतना अच्छा निकल पा रहा है तो उससे सीखा जाना चाहिए। जनसत्ता में मेरे वरिष्ठ रहे श्री देवप्रिय अवस्थी ने लिखा है, अपने संपर्कों का इस्तेमाल करके किसी दिन द टेलीग्राफ का पहला पेज और प्रमुख समाचारों का शीर्षक बनाने की प्रक्रिया पर एक रिपोर्ट बनाइए। सचमुच इस अखबार में साहस और प्रयोग का अद्भुत संगम नजर आता है।

निश्चित रूप से यह पत्रकारिता करने और पढ़ाने वालों का विषय होना चाहिए। पर अभी तक क्या किसी ने इस ओर ध्यान दिया? मेरे ख्याल से नहीं। मेरी चिन्ता यह है कि जब टेलीग्राफ जैसे अखबार ही नहीं होंगे तो टेलीग्राफ जैसी पत्रकारिता सीख कर क्या करेंगे? पत्रकारों को गाली देना बहुत आम है। कोई भी मुंह उठाता है – दलाल से लेकर डरपोक कुछ भी कह जाता है। पर कभी किसी ने यह सोचा कि पत्रकार दलाली नहीं करे तो घर कैसे चलाए? वेजबोर्ड की सिफारिशें नहीं मानने से लेकर न्यूनतम वेतन तक नहीं देने वाले अखबार विज्ञापनों से भरे रहते हैं। पर वहां काम करने वाले लोग नहीं हैं। झुकने के लिए कहा गया तो रेंगने लगे सो अलग। आखिर वे जो कमाते हैं कहां जाता है?

अखबारों के खर्चों, कमाई का कोई हिसाब है? होना चाहिए? हिन्दी अखबारों के संस्करण पर संस्करण निकलते जा रहे हैं। टेलीग्राफ गिनती के संस्करण निकालता है पर प्रसार संख्या करोड़ में तथा सभी राज्यों से संस्करण निकालने का दावा करने वाले अखबारों में प्रतिभा की पूछ क्यों नहीं है और अगर अगर है तो वह पन्ने पर क्यों नहीं आता? क्या सरकार को इसपर ध्यान नहीं देना चाहिए? पर सरकार की जो प्राथमिकताएं हैं उनमें खुद तो वह यह सब करने से रही, पाठक इसकी मांग भी नहीं करते हैं। तो पत्रकार अपना घर चलाए कि मुफ्त में क्रांति करे?

आप गरियाते रहिए पत्रकार और पत्रकारिता को आप भविष्य की नहीं सोचेंगे तो पत्रकारिता में भी वही होगा जो राजनीति में हुआ। और लोग नहीं करें तो यह काम टेलीग्राफ से जुड़े लोगों को भी करना चाहिए। अच्छा अखबार और अच्छे पत्रकार देश की जरूरत हैं।

Post Source : Sanjaya Kumar Singh Facebook