आखिर कहां गए पत्रकार संगठनों के तथाकथित नेता

Arun Kumar Tripathi

इस समय जबकि सम्पूर्ण विश्व कोरोना जैसी महामारी से जूझ रहा है, ऐसे में हमारे पत्रकारिता क्षेत्र के तमाम संस्थान या तो बैंड हो गए या बंदी को कगार पर आ चुके। जो बैंड हो गए वहां कार्यरत हमारे तमाम पत्रकार साथी घर बैठा दिए गए। और जो संस्थान कार्य कर रहे हैं वहां भी तनख्वाह मिलने के लाले पड़ चुके हैं। क्या इस वक्त हमारे बीच हमारी दारुण व्यथा सुनने किसी भी संगठन का कोई तथाकथित नेता आया? फिर भी हम इनकी राजनीति का मोहरा बन कर इनके पीछे टहला करते हैं। इस संगठन का जब चुनाव आता है तो ये लोग लाखों लाख रुपये मांस मदिरा में उड़ा देते हैं, लेकिन क्या इन संगठनों या इनके तथाकथित नेताओं में से कोई हमारे पास आया जो हमसे यह पूछता कि भाई आपके पास खाने को कुछ है या नहीं? आप जीवित कैसे हो? या इन तथाकथित नेताओं ने हमारी सुध लेने के लिए शासन को अवगत कराया। सुनने में है कि होली-दीपावली पर सूचना विभाग द्वारा कुछ पत्रकारों के यहां मिठाई वगैरह भेजी जाती है, लेकिन इस बुरे वक्त में हमारे इन तथाकथित नेताओं ने सूचना विभाग के मुखिया को हम पत्रकारों की वास्तविक स्थिति से अवगत कराया कि उनके पत्रकार साथी इस समय किस स्थिति से गुजर रहे हैं। हममे से तमाम साथी किराये के मकान में रहते हैं, हमारे कार्य स्थल वाले संस्थानों का कहना है कि इस समय हमारे विज्ञापन बन्द हो चुके हैं एजेंसियां हमारे बिलों के भुगतान नही दे रही हैं तो हम कहाँ से आप लोगों का भुगतान कर सकते हैं। उनका कहना है कि आप लोग यदि ऐसे में सहयोग करके कार्य कर सकते हों तो करें अन्यथा कोई और कार्य देख लें। क्या हमारे तथाकथित नेताओं का फर्ज नही बनता कि वो हमारे बारे में कुछ सोचें और सरकार को हमारी मदद के लिए प्रेरित करें। इसमे कोई संदेह नही कि इस महामारी में जितनी सहनशीलता से हमारे यशस्वी मुख्यमंत्री जनता को खाद्यान्न और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति करा रहे हैं वह काबिले तारीफ है। इसीलिए मुझे पूरा विश्वास है कि यदि सूचना विभाग के मुखिया को हमारी और हमारे कार्यदायी संस्थानों की दीन दशा के बारे में अवगत कराया जाएगा तो उनके द्वारा माननीय मुख्यमंत्री जो को जब हमारी दशा बताई जाएगी तो निश्चिन्त ही वे हमारे हितों का ध्यान रखेंगे। परंतु क्या किसी तथाकथित पत्रकार नेता ने हमारे बारे में सोचा???