आंखों में नींद और थकावट भी पर नौकरी से बड़ी नही


रेलमंत्री आराम से सो रहे होंगे, मीडिया वाले भी आराम कर रहे हैं लेकिन दिल्ली की मंडी हाउस के सर्किल पर यह विकलांग युवा जाग रहे हैं।

कोई 50 घंटे सफर करके आया है तो कोई 40 घंटे। थकावट बहुत है लेकिन नौकरी से बड़ी थकावट नहीं है। आंखों में नींद है लेकिन नौकरी की चिंता ने इनकी नींद उड़ा ली है। चयन होने के बावजूद भी यह आज बेरोजगार है।

इन मे से कोई चल नहीं पा रहा है तो कोई देख नहीं पा रहा है। रेलवे में ग्रुप D में इनकी चयन हुई थी लेकिन बाद में इनका नाम हटा दिया गया। विकलांग कोर्ट में इन लोगों की केस चल रही है।

आज चौथी बार था जब रेलवे बोर्ड अपना पक्ष रखने के लिए कोर्ट नहीं पहुंचा। सुबह 10 बजे जब मैं पहुंचा उसे काफी पहले यह लोग मंडी हाउस पहुंच चुके थे।इनमें कई महिलाएं भी है जो अकेले बस और ट्रेन सफर करके दिल्ली पहुंची है।

सोचिए अपने केस के लिए यह युवा 40 घंटे सफर करके दिल्ली पहुंचे लेकिन रेलवे बोर्ड दिल्ली में होते हुए भी हाज़िर नहीं हुआ। मीडिया वाले भी इनके समस्या दिखाने नहीं पहुंचे। बाकी सब आप समझ लीजिए। कल इनके नाम बदलकर कुछ रख लीजिए उनका समस्या का समाधान नहीं होने वाला।