क्या वास्तव में कारगिल एक युद्ध था ?

कारगिल

अभी कारगील के शौर्य की गाथाओं से गगन गूंजेगा लेकिन क्या वास्तव में कारगिल एक युद्ध था ? क्या कारगिल हमारे लिए गौरव था ? क्या हमारे जांबाज जवान सियासत की चौसर पर शहीद नहीं हो गए थे ? सबसे बड़ी बात कारगिल से हमने सबक लिया क्या ? यदि हाँ तो गलवान पर ठीक वैसा ही कब्जा कैसे हो गया ?

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1998 की सर्दियों में जब भारतीय सेना LoC को छोड़कर कम बर्फीले वाले स्थान पर चली गईं तो पाकिस्तान सेना ने अपने करीब 5 हजार जवानों के साथ भारतीय पोस्टों पर कब्जा कर लिया। इस दौरान पाक सेना ने तोलोलिंग, तोलोलिंग टॉप, टाइगर हिल और राइनो होन समेत इंडिया गेट, हेलमेट टॉप, शिवलिंग पोस्ट, रॉकीनोब और .4875 बत्रा टॉप जैसी सैकड़ों पोस्टों पर कब्जा कर लिया था।

1999 की गर्मियों के दौरान जब भारतीय सेना दोबारा अपनी पोस्टों पर गई तो पता चला कि पाकिस्तान सेना की तीन इंफेंट्री ब्रिगेड कारगिल की करीब 400 चोटियों पर कब्जा जमाए बैठी है। पाकिस्तान ने डुमरी से लेकर साउथ ग्लेशियर तक करीब 150 किलोमीटर तक कब्जा कर रखा था।यहाँ तक कि पाकिस्तान का सेना प्रमुख परवेज मुशर्रफ हमारे इलाके में रात बिता कर चला गया. जनरल परवेज मुशर्रफ ने एक हेलिकॉप्टर से नियंत्रण रेखा पार की थी और भारतीय भूभाग में करीब 11 किमी अंदर एक स्थान पर रात भी बिताई थी। मुशर्रफ के साथ 80 ब्रिगेड के तत्कालीन कमांडर ब्रिगेडियर मसूद असलम भी थे। दोनों ने जिकरिया मुस्तकार नामक स्थान पर रात बिताई थी।

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फ़रवरी 1999 में नवाज़ शरीफ और अटल बिहारी वाजपेयी के बीच लाहौर में एक समझौता हुआ था जिसके मुताबिक दोनों देशों ने बातचीत के जरिए एक नए रिश्ते की शुरुआत करने की प्रतिबद्धता दिखाई थी. तब पाक सेना हमारे इलाके में घुसने की सारी तैयारी कर रही थी .

हमारा ख़ुफ़िया तन्त्र सवालों के गहरे में था लेकिन हमारा राजनितिक नेतृत्व शांति की बात कर रहा था . हालाँकि इस पर कई रिपोर्ट है कि कुछ ख़ुफ़िया रिपोर्ट को क्यों नज़रंदाज़ किया गया ? एक साल तक पाकिस्तान की फौज के पांच हज़ार सिपाही उस इलाके में पहाड़ों पर चढ़ कर अपने लिए सुरक्षित जगह बनाते रहे और ना केवल सीमा पार के हमारे जासूस और ना ही सीमा के लोकल इन्फिर्मारों से खबर मिली .

पाकिस्तान की योजना भारत प्रशासित कश्मीर में पहाड़ की कुछ चोटियों पर कब्ज़ा करने और फिर श्रीनगर-लेह राजमार्ग को बंद करने की थी. इस सड़क को बंद करना पाकिस्तान की प्रमुख रणनीतियों में शामिल था क्योंकि यह एकमात्र रास्ता था जिससे भारत कश्मीर में तैनात सैनिकों को सैन्य हथियार भेजता था. नसीम के मुताबिक कारगिल हमले की योजना बना रहे पाकिस्तानी जनरलों का मानना था कि हालात बिगड़ेंगे और भारत कश्मीर विवाद पर बातचीत के लिए मजबूर होगा. पाक सेना के चार जरनल योजना बना रहे थे , उसमें सौ से ज्यादा सेना के अफसर और राजनेता शामल थे और हमारे ख़ुफ़िया तन्त्र को हवा नहीं लगी ? यह हमारी विफलता है कि नहीं ?

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पाकिस्तान के लिए भी वहां चढ़ना कोई सरल नहीं था, और तभी जब भारतीय सेना ने कब्जा किया और पाकिस्तान सेना भागी तभी वे बड़ी संख्या में मारे गए क्योंकि लौटने का रास्ता भी बहुत दुर्गम था .पहाड़ों की 16 से 18 हज़ार फीट की ऊंचाई से लौटना बहुत मुश्किल था. कई खाइयों को पार करना होता था और ऊपर से भीषण ठंड थी

भारतीय सुरक्षा बलों के करीब 2 लाख जवानों ने हिस्सा लिया था, जिसमें से 527 जवान शहीद हो गए थे, वहीं 1300 से ज्यादा जवान घायल हुए थे। इसमें कोई शक नहीं कि हमारी सेना के जवानों ने देश की मिटटी के लिए अपने जान की बाजी लगा दे और उनके प्रति आदर, कृतज्ञता और नमन हर भारतीय का फ़र्ज़ है लेकिन क्या यह एक राजनितिक रणनीतिकार के लिए भी गर्व का पल है क्या ?
हो सकता है मेरा आकलन गलत हो, लेकिन ठीक यही भाव मेरा गलवान के समय रहा— कारगिल के बाद की कई रिपोर्ट जिसमें इलेक्ट्रानिक , मानवीय और अंतर्राष्ट्रीय ख़ुफ़िया तन्त्र का एक एकीकृत केंद्र बनाने की बात ही- उस पर अमल क्यों नहीं हुआ ? पिछली दस साल की मनमोहन सरकार और मौजूदा में भी , हमारे जवान आज भी शहीद हो रहे हैं गलवान घाटी में हर दिन– गश्त करते समय पैर फिसलने से या अन्य कारणों से — सेना हमारा सम्मान और किसी भी समस्या का आखिरी विकल्प है , ऐसे में सेना को सियासत का औजार बनाना उचित नहीं .

युद्ध मज़ाक नहीं होता — उसमें हज़ारों करोड़ के गोला बारूद का धुँआ पलों में हो जाता है — यह पैसा हमारे स्कूल, स्वास्थ्य, सडक जैसे बजट से कटौती कर होता है — सतर्कता ही सबसे बड़ा शौर्य और साहस है और यह हमारे जवानों के असमय काल के गाल में समाने से भी रोकता है-Pankaj Chaturvedi

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