पत्रकारों की मुख्यालय मान्यता पर दिख रहे संकट के बादल छटने के आसार

न शब्दों का जाल है, न अल्फाजों की बाजीगरी है !
न जज़्बातों से खेलने का कोई पुराना महारथी है !!

Dr. Mohammad Kamran (Freelance Journalist) 9335907080

मान्यता समिति के चुनाव में अध्यक्ष पद पर इस बार #मनोज मिश्रा हम सबकी एक आवाज़ है, न हारने, हराने की कोई बात हैं, न ही जीतने, जीताने के लिए साम दाम दंड का कोई हथियार है।

एक बार फिर नहीं, पहली बार हमारे अपने नेतृत्व की बात है और यही वजह है कि मनोज मिश्रा के कारवां में इस वक़्त उत्तर प्रदेश के अधिकांश पत्रकार एकजुटता के साथ दिखाई दे रहे है। अध्यक्ष पद के प्रत्याशी मनोज मिश्रा द्वारा ना तो कोई लंबे चौड़े वादे किए जा रहे है और न ही कोई प्रलोभनी शब्दों का घोषणा पत्र जारी किया है, फिर आखिर उन्होंने ऐसा क्या कह दिया, क्या कर दिया कि उनकी प्रसिद्धि, लोकप्रियता देखकर पत्रकार, नौकरशाह, राजनेता सभी लोग मनोज मिश्रा की जीत की बात कर रहे हैं ?

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उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के चुनाव में मान्यता प्राप्त पत्रकारों की भागीदारी होती है और किसी भी सरकार द्वारा पत्रकारों को।मिलने वाली तमाम मूलभूत सुविधाएं प्राथमिकता से मान्यता प्राप्त पत्रकारों को ही मिलती है और आज सबसे ज़्यादा संकट इसी मान्यता पर मंडरा रहा है और कोई भी इस संकट से लड़ने या दूर करने की बात करते नही दिख रहा है लेकिन भाई मनोज मिश्रा ने इस संकट को दूर करने की बात को न सिर्फ उठाया है बल्कि कारगर फार्मूला भी तैय्यार किया है।

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हम सभी भली भांति अवगत है कि भारतीय अर्थव्यवस्था और कोरोना वायरस के चलते खबरें करने वाले पत्रकारों और मीडिया संस्थानों प्रिंट, एलेक्ट्रोनिक, डिजिटल पर सबसे बड़ा संकट मंडरा रहा है और बड़ी संख्या में पत्रकारों को नौकरी से निकाला जा रहा है, प्रधानमंत्री माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी अपने संबोधन में मीडिया को कोरोना महामारी से लड़ने में अहम भूमिका की बात तो कही है लेकिन मीडिया को इस संकट से उबारने के लिए कोई भी सार्थक प्रयास नही किया जा रहा है वहीं मनोज मिश्रा द्वारा केंद्र सरकार और प्रदेश सरकार के नुमाइंदों के सामने इस बात को प्रमुखता से उठाया गया है और प्रिंट मीडिया की गंभीर स्थिति पर मंथन विचार विमर्श करने के बाद बताया गया कि कोरोना महामारी की वजह से अख़बारों का सरकुलेशन तो घटा ही है, विज्ञापन की संख्या भी घट गयी है, लेकिन सरकार द्वारा किसी भी तरीके की कोई राहत नहीं दी गई है, ऐसे में प्रिंट इंडस्ट्री को बचाने के लिए सरकार को 2 वर्ष की टैक्स में पूरी छूट देनी चाहिए और अखबार के कागज पर लगने वाली इंपोर्ट ड्यूटी को हटाना चाहिए क्योंकि यदि मीडिया संस्थान रहेंगे तो पत्रकार रहेंगे, पत्रकार रहेंगे तो मान्यता रहेगी, मान्यता रहेगी तो मान्यता प्राप्त पत्रकार होंगे तभी इस समिति का वजूद होगा और अगर मान्यता प्राप्त पत्रकार ही नही रहेंगे तो ऐसी मान्यता समिति का अस्तित्व भी नही बचेगा।

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केंद्र सरकार द्वारा जो नई नियमावली लागू की गई है उससे बड़ी संख्या में समाचार पत्रो को सर्कुलेशन घटाना पड़ा है जिससे अनेक पत्रकारों के ऊपर आर्थिक संकट के साथ साथ मान्यता पर भी संकट आ गया है, ऐसे में मीडिया संस्थान अपने साथ काम करने वालों के प्रति कैसे संवेदना रखे, नौकरी से ना निकाले और मान्यता बरकार रहे, ये एक बड़ा प्रश्न है और मनोज मिश्रा ने इसके समाधान के लिए माननीय मुख्यमंत्री योगीजी से वार्ता करने की बात कही है और उनके सम्मुख उत्तर प्रदेश प्रेस प्रतिनिधि मान्यता नियमावली 1978-1995 के प्रावधानों को लागू करने की मांग के किये हर संभव प्रयास करने की बात कही है जिसके लागू हो जाने के बाद जिन पत्रकारों की मान्यता ऐसे समाचारपत्रों से हैं जिनको सर्कुलेशन 25000 से कम करना पड़ रहा है। और उनपर मान्यता का खतरा मंडरा रहे बादल छटने के साफ साफ आसार दिखाई दे रहे है।

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हम सबका साथ और मनोज भाई का सकारात्मक प्रयास कारगर दिखे इसके लिए हम सबको एकमत से मनोज मिश्रा को अध्यक्ष पद पर भारी मतों से विजयी बनाना होगा तभी मूर्त रूप लेंगे ऐसे अनेक सकारात्मक प्रयास।

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