प्रसाद का शाब्दिक अर्थ हुआ परिभाषित

गुरु के चरणों में श्रीराम का प्रसाद !

प्रसाद का शाब्दिक अर्थ हुआ परिभाषित !!

Dr. Mohammad Kamran (Freelance Journalist) 9335907080

सियासत अंधी होती है , न दिन-तारीख, न महूर्त, न बीमारी, न बेरीज़गारी और न हीं कोरोनॉ की मारा मारी, सियासत कुछ नही देखती, जिस जनता से बनती है ये सियासत, सियासी फ़ायदे के लिए उसकी भी नही सोचती, सरकार बनानी हो या गिरानी हो, जन प्रतिनिधियों की ख़रीद फ़रोख्त हो सियासत कभी नही रुकती, सियासत आवाम को डरा कर अपना काम करती है, ऐसा ही एक बेहतरीन, जज़्बाती, धार्मिक, इतिहासिक सियासी रंग उत्तर प्रदेश की कोरोना से जूझती जनता के सामने 5 अगस्त को खिलाने की कोशिश की गई जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत 200 हस्तियों ने भाग लिया। सियासत का क्या फायदा हुआ ये तो वक़्त के तराज़ू से पता चलेगा लेकिन उत्तर प्रदेश की जनता को कई सालों के तनाव से मुक्ति मिली और अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण हेतु भूमि पूजन का काम पूरा हुआ।

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मज़हब कोई भी हो, इबादत या उपासना के पश्चात प्रसाद या तबुर्रक बांटने का एक रिवाज़ सदियों से चला आ रहा है और अयोध्या में भूमि पूजन के बाद भक्तों को प्रसाद बांटने के लिए बनाये गए करीब 110000 लड्डू में हमें भी प्रसाद मिलने का सौभाग्य हासिल हुआ। ऐसे विशाल आयोजनों का प्रसाद मिलना अपनेआप में ही आनंददित करता है क्योंकि कहीं न कहीं प्रसाद के माध्यम से हमारा और ईश्वर का एक राब्ता या रास्ता कायम होता है, ईश्वर का स्मरण हो और सामने गुरु के दर्शन हो तो कबीर दास का दोहा ज़ेहन में आना स्वाभाविक है,

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गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।

बलिहारी गुरू अपने गोविन्द दियो बताय।।

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इस दोहे के स्मरण होने के पश्चात श्री राम के प्रसाद का सही स्थान गुरु के, साक्षातदर्शन पर ही परिभाषित करता है क्योंकि प्रसाद शब्द तीन अक्षरों से बना है… प्र सा द… जिसमें ‘प्र’ यानि प्रभु के, ‘सा’ यानि साक्षात् और ‘द’ से तात्पर्य है दर्शन, और फिर गुरु के सम्मुख पहुंच कर जो आनंद हम सबको इस प्रसाद ग्रहण से मिला उसे शब्दों में बयान नही किया जा सकता, चेहरे पर आए भाव से पढ़ा जा सकता है। भाई Ajay Verma के माध्यम से आज हम सब सौभाग्यशाली महसूस कर रहें है, अयोध्या से आये इस प्रसाद के माध्यम से गुरु और गोविंद दोनों की प्राप्ति हो गयी और कबीर दास की स्मृतियां भी जिंदा हो गयी जिन्हें हम एक ऐसे संत के रूप में पहचानते हैं जिन्होंने हर मज़हब, हर वर्ग के लिए अनमोल सीख दी है और उनमें से उनकी सबसे बड़ी सीख थी ‘गुरु के लिए सम्मान’ की!

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गुरू बिन ज्ञान न उपजै, गुरू बिन मिलै न मोष।

गुरू बिन लखै न सत्य को गुरू बिन मिटै न दोष।।

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सही कहा था कबीरदास जी ने बिना गुरू के ज्ञान का मिलना असम्भव है। लेकिन आज के इस डिजिटल दौर की तेज रफ्तार पीढ़ी गूगल को अपना गुरु समझती है, गूगल बाबा सवालों के जवाब तो दे सकते है, जानकारी उपलब्ध करा सकते है लेकिन सत्य एवं असत्य का ज्ञान नही दे सकते, उचित और अनुचित की जानकारी नही उपलब्ध करा सकते। जब तक मशीनी गूगल बाबा को गुरु मानकर इंसान ज्ञान हासिल करेगा वो अज्ञान रूपी अंधकार में भटकता रहेगा, वही इंसानी गुरु के रूप में मिला ज्ञान मायारूपी दुनिया मे इंसान को सही मार्ग दिखलायेगा और जीवन सफल बनाएगा। हमें जीवन की डगर में सही, सच्ची, उचित, अनुचित ज्ञान देने वाले गुरु की प्राप्ति हुई है जिनके साथ आज प्रसाद ग्रहण कर प्रसाद को सही मायने में परिभाषित किया गया।

डिजिटल गुरु, फेक प्रोफाइल, फेक न्यूज़, फेक दुनिया से बचने के लिए गुरू की शरण में जाओ। गुरू ही सच्ची राह दिखाएंगे,,,
जय हो गुरुवार ,, Arvind Tewari

गुरू पारस को अन्तरो, जानत हैं सब संत।

वह लोहा कंचन करे, ये करि लेय महंत।।

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