मोदी को सेक्स सिम्बल मानने वाले गुप्ता जी गलतबयानी कर रहे हैं

 

Awesh Tiwari

हिन्दी पत्रकारिता के सर्वनाश की शुरुआत नोएडा, दिल्ली गाजियाबाद में शीशे के उन बंद कमरों से हुई जिनमे सम्पादक नाम का जीव बैठता है। इन सम्पादकों ने देश का मतलब मोदी समझ रखा है जैसे भक्त देवता मतलब मोदी समझते हैं। शेखर गुप्ता बड़े पत्रकार हैं और सम्पादक हैं। सत्ता के गलियारों में उनका नाम बेहद सम्मान के साथ लिया जाता हैं। वो इंडियन एक्सप्रेस जैसे बड़े अखबार के सम्पादक रहे हैं अब द प्रिंट नाम का एक पोर्टल उनके सम्पादन में ही चलता है। शेखर गुप्ता आजकल जल्दी में बहुत हड़बड़ी में हैं। उन्हें लगता है कि मोर को दाना खिलाते मोदी ही इस देश की किस्मत हैं।

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आज शेखर गुप्ता का लिखा एक लेख बेहद चर्चा में हैं । उन्होंने भास्कर में लिखा है कि आलोचक मान लें कि मोदी को खुद मोदी ही हरा सकते हैं या कोई करिश्माई और नए विचार वाला नेता लाइए’। शेखर गुप्ता ने यह तब लिखा है जब बीजेपी की सरकार एक के बाद एक राज्यों से जा रही है, हर जगह जनता उद्वेलित हैं गालियाँ दे रही वही बिहार एवं बंगाल ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को भूत बना रखा है।

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शेखर गुप्ता सवाल खड़ा करते हैं कि मोदी की लोकप्रियता कम क्यों नहीं हो रही है? इसके लिए वो इंडिया टुडे के सर्वे का उदाहरण देते हैं जो खुद भी विवादों के घेरे में हैं और जिस पर मैं विस्तार से लिख चूका हूँ। मोदी की लोकप्रियता बढ़ी है इसका अंदाजा शेखर घर में बैठकर टीवी और अखबार पढ़कर लगा रहे हैं। मुमकिन है यह अंदाजा उन्हें लोकसभा चुनाव में बीजेपी को मिली भारी विजय से लगा हो या फिर कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन न होने से। लेकिन मुझे लगता है उन्हें कोरोना का डर त्यागकर आम आदमी की तरह घर से बाहर निकलना चाहिए।

शेखर गुप्ता मोदी सरकार के अजर अमर होने बात उस वक्त में कह रहे हैं जब यह लगभग स्पष्ट हो चुका है कि भाजपा चुनावों के दौरान सोशल मीडिया के महारथियों के साथ मिलकर कैम्ब्रिज एनालिटीका जैसे बड़े धोखे को अंजाम देती रही है। जब यह तय है कि वह चुनाव वाले राज्यों में साम्प्रदायिक विभाजन के लिए हर संभव कोशिश करेगी ।

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दरअसल शेखर गुप्ता ने जो लिखा है उसे समझने के लिए शेखर गुप्ता जी की पत्रकारिता को भी समझने की जरुरत है। देश में इस वक्त कई नेता, कई पत्रकार, कई साहित्यकार ऐसे हैं जो मोदी के पक्ष में नहीं खड़े हैं लेकिन जिनका मन रह रह कर मोदी जी के महान व्यक्तित्व से अभिभूत होता रहा है। कांग्रेस का जो चिट्ठी काण्ड हुआ वह इसी खेमे के नेताओं की वजह से हुआ, इंडिया टुडे ग्रुप और एक्सप्रेस ग्रुप समेत तमाम समाचार पत्रों और वेब में कई ख़बरें इसी खेमे के पत्रकारों की वजह से छपती रही हैं।

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दरअसल यह वही शेखर गुप्ता हैं जिन्होंने अपने पोर्टल में ग्रामीण औरतों के लिए नरेन्द्र मोदी को सेक्स सिम्बल बता दिया था। मुझे यह कहने में कोई ऐतराज नहीं है कि शेखर गुप्ता ने अपने लेख में मोदी को उसी चश्मे से देखा है जिस चश्मे से अंजना, रुबिका, चौधरी, सरदाना, आलोक मेहता आदि देखते हैं. जानता हूँ कि यह दृष्टि तात्कालिक है लेकिन उम्मीद करता हूँ कि बदलेगी। मोदी की लोकप्रियता के घटते ग्राफ को समझने के लिए एक बेहद तार्किक, वैज्ञानिक और जमीनी दृष्टिकोण होना भी जरुरी है.मोदी सरकार अपने दिन गिन रही है मैं वह कोलाहल सुन पा रहा हूँ जो किसी भी मनबढ़ सत्ता को उखाड़ फेंकता है।

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