बाहर से आये लोग गांवों में बन रहे मुसीबत

गांवों के भीतर कार्य देख रहे जिम्मेदारो की कार्यशैली संदिग्ध

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  • क्वरेन्टीन,लॉकडाउन का असर गांव में नही
  • बाहर से आये लोग गांवों में बन रहे मुसीबत

सुल्तानपुर :महामारी के भयंकर संकट से गुजर रहे देश मे इन दिनों जमातियों ने जो बर्बरतापूर्ण तांडव कर रखा है उससे कोई अछूता नही है। लाकडाउन तो दूर, सही सोशल डिस्टेंस की इनके लिए कोई अहमियत नही रख रहा है। ऐसे में लगभग सभी ग्राम पंचायतों में आने वाले मुसाफिरों को क्यूरेण्टाइन के उद्देश्य से विद्यालयों, पंचायत भवनों में जगह दी गयी है।इसके क्रम में कुछ ग्राम पंचायतों से ऐसी सूचना मिल रही है कि लॉकडाउन के दौरान बाहर से आने लोग वहां न रुककर बिना भय के अपने अपने घरों में रहना शुरू कर दिये हैं…

फिलहाल अगर इस तरह की गैर जिम्मेदाराना रवैया यदि परिवार,गांव के लोगों द्वारा किया जा रहा है तो बिल्कुल ठीक नही है। क्यूरेण्टाइन कराना एक प्रकार से परिवार और समाज का परम दायित्व बनता है।ऐसे में मुसाफिरों और उनके परिवार को बताएं कि क्यूरेण्टाइन परिवार व मानव समाज को बचाने की एक सटीक प्रक्रिया है।

दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि एक ग्रामपंचायत में लेखपाल, आशा, सफाईकर्मी, कोटेदार, ग्रामपंचायत सचिव, आंगनबाड़ी कार्यकत्री, आंगनबाड़ी सहायिका जैसे अध्यक्ष सरकार के प्रतिनिधि मात्र प्रतीकात्मक रूप से सम्बन्धित को सूचना देकर अपने कार्यों की इतिश्री कर रहे हैं।जबकि इस समय पूरी संवेदनशीलता के साथ बाहर से आये लोगों को क्वारन्टीन कराने का कार्य मजबूती से कराये जाने की आवश्यकता है।क्वरेन्टीन ही कोविड 19 जैसे संक्रमण से बचने का सही तरीका है।अगर ऐसे ही चलता रहा तो गांवों के भीतर की स्थिति आने वाले समय में बड़ी ही भयावह होगी और तब हम कुछ भी करने में सक्षम नहीं होंगे।शहरी क्षेत्रों से अधिक गांवों को संतुलित करना हमसभीका प्रथम कार्य हो तभी हम इस संक्रमण को रोकने में सफल हो सकते हैं।
जरा सी चूक कई ज़िन्दगी पर भारी पड़ सकती है।गांवों के भीतर लाक डाउन व बाहर से आये व्यक्तियो को नियमानुसार क्वारेन्टीन कराना बहुत ही आवश्यक है।
Post Source : Journalist Rajesh Misra

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