7 दिन नहीं 700 दिन तक होती होली

उड़े कनकइया…घाट है सरसैया !
ऊपर चले रेल का पहिया…नीचे बहती पवित्र गंगा !!
यहीं तो है अपना कानपूर नगरिया !!

हम तो ठहरे कनपुरिया, नज़ाकत नफ़ासत तो बहुत है लेकिन त्यौहार तो पूरे हर्षो उल्लाहस से कनपुरिया तरीक़े से ही मनाते है और होली के इस रंगा रंग त्यौहार को जब हमारे मादरे वतन कानपूर में 7 दिन तक मनाया जाता है तो प्रदेश की राजधानी लखनऊ में रहकर हम भी इसे एक सप्ताह तक मनाते है। ज़्यादातर लोगों ने 10 मार्च को मात्र कुछ घंटों में ही रंग, गुलाल खेलने के बाद होली के त्यौहार को रंग लगे कपडे की तरह उतार कर पुराने बक्से में बंद कर दिया था वहीँ कानपुर शहर में होली सात दिन तक जारी रहती है जिसका समापन गंगा मेले के उत्सव के साथ होता है,, अंग्रेज़ी हुकूमत की दमनकारी नीतियों के विरोध में में शुरू हुई ये परम्परा आज भी कायम है जिसमें पूरे शहर के लोग बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं.

1942 में होली के दिन हटिया बाजार में अंग्रेजी हुकूमत की परवाह किए बगैर लोग रंग-गुलाल खेलते हुए मस्ती से त्यौहार मना रहे थे और किसी ने एक अंग्रेज अधिकारी के ऊपर रंग डाल दिया और गुस्सए अंग्रजों सिपाहियों ने गुलाब चंद्र सेठ, बुद्धूलाल मेहरोत्रा, नवीन शर्मा, विश्वनाथ टंडन, हमीद खान और गिरिधर शर्मा सहित करीब 45 लोगों को गिरफ्तार कर जेल में बन्द करा दिया, जिस बात पर लोगों ने विरोध जताना शुरू किया और विरोध इस तरह किया गया कि गिरफ्तार लोगों को छोड़ने के लिए लगातार रंग-गुलाल खेला जाता रहा. लगातार सात दिन के विरोध के बाद अंग्रेजों ने जब उन गिरफ्तार लोगों को रिहा किया तो उस दिन अनुराधा नक्षत्र था जिसके बाद रिहा किये लोगों ने सिविल लाइन्स के सरसैय्या घाट स्थित जेल से निकल कर वहीं खेली खेली और फिर गंगा में स्नान किया जिसके बाद से लगातार ये परम्परा आज तक कानपुर में कायम है.

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दमनकारी नीतियों का विरोध अंग्रेजी शासनकाल में भी था और अंग्रेजी हुकूमत के कानों तक विरोध की आवाज़ पहुंचती थी और उसपर कार्यवाही भी होती थी, आज के युग में दमनकारी नीतियों के विरोध में अगर कोई भगत सिंह, बिस्मिल,चंद्रशेखर आज़ाद के किरदार को निभाने की सोचे भी तो हुकूमत उसके साथ कैसे रंग लगाएगी ये देखा जा सकता है। 7 दिन के विरोध में अंग्रेजी हुकूमत ने बात मान ली थी और निर्दोष लोगों को जेल से रिहा भी कर दिया था, आज का दौर होता तो कानपूर में 7 दिन नहीं 700 दिन तक होती होली — शांतिपूर्वक विरोध प्रदर्शन का अधिकार तो संविधान से मिला है लेकिन हुकूमत कब ध्यान देगी इसका संविधान मे कोई उल्लेख नही मिलता–इसलिए आज के दौर में विरोध करते रहिए, 7 दिन क्या 700 दिन तक डटे रहिये, हिम्मत न हारिये, वो दौर कुछ और था, अंग्रेज़ थे, बाहर से आये थे, मान गए, ये दौर कुछ और है, अपने है, देर से मानेंगे लेकिन मान जाएंगे, हौसला बनाये रखिये और हम होंगे कामयाब एक दिन तराना गुनगुनाये रखिये ,, ।
— बुरा न मानो होली है —-
डॉ मोहम्मद कामरान

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