गुटबाजी और अपने निहित स्वार्थ में सिमट गई पत्रकारो की समिति

एस.के. सिंह

लखनऊ। एक है श्रमजीवी पत्रकारों की फेडरेशन और एक है राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त पत्रकारों की चयनित समिति, फेडरेशन का हाल डॉ जैन के दवाखाने की तरह है, हर तरफ नक्कालों से सावधान का नारा है, बाप बेटे की दुकान, यही है असली फेडेरेशन की पहचान। तो दूसरी तरफ विदेशी भ्रमण का है पैगाम, पत्रकारो के हितों की किसे है पहचान। यहां तो सिर्फ अपनी अपनी है दुकान। फेडेरेशन के साथ गुटबाजी की शिकार होती है उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवादादाता समिति की चयनित संस्थान जिसका कार्यकाल का प्रावधान मात्र 2 साल का होता है, प्रधानी, विधायकी जैसे चयनित पद का कार्यकाल भी 5 साल का होता है। लेकिन इस संगठन का कार्यकाल मात्र 2 साल का होता है। इसलिए चयनित पदाधिकारियों के बीच पत्रकार हितों के लिए प्रतिस्पर्धा कम ही देखने को मिलती है….कही सरकारी मकान तो कही विज्ञापन की दुकान की खींचातानी में ही ये 2 साल बीत जाते है। बदलते वक्त के साथ मान्यता समिति के स्वरूप में कोई खास बदलाव नहीं आया।

लेकिन चुनाव में जरूर पदाधिकारियों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ गयी। मान सम्मान को लेकर कोई प्रतिस्पर्धा नही है लेकिन जहां धन दौलत आती है वहां बाप बेटे, भाई भाई के रिश्तों में दरार आ जाती है, जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण वर्तमान मान्यता समिति के कार्यकलापों को देखने से मिल रहा है, मान्यता समिति का कार्यकाल अभी समाप्त होने में 4 से 5 माह शेष है लेकिन अभी से संभावित उम्मीदवारों ने अपनी अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। वहीं मान्यता समिति के वर्तमान पदाधिकारी भी सत्ता पर रहने का मोह नही छोड़ पा रहे है और अपनी अपनी जुगाड़ में तिकड़मबाजी करते घूम रहे है। बुद्धिजीवियों के इस संगठन में मात्र 900 से 1000 सदस्यों के बीच समिति का गठन होता है लेकिन बदलते वक्त के साथ समितियों के पदाधिकारियों की आमदनी में जिस तरह की बढ़ोतरी हुई है उसने इस छोटे से बुद्धिजीवियों के चुनाव में भी चार चांद लगा दिए है। अभी चुनाव में 4 से 5 महीने का वक्त है लेकिन चुनाव से पहले ही महँगे फोन और महंगी बोतलों की दुकान सज गयी है, जिसे देखकर लगता है इस समिति के पदाधिकारियों की आमदनी करोड़ो में होती है। सूचना एवं जनसंपर्क विभाग से मिली जानकारी के अनुसार समिति के एक वरिष्ठ पदाधिकारी के इलेक्ट्रॉनिक चैनल को मात्र एक साल में लगभग 1 करोड़ का विज्ञापन दिया गया, वहीं एक और पदाधिकारी की फाइल कॉपी वाली मासिक पत्रिका और समाचार पत्र को इससे अधिक मूल्य का विज्ञापन दिया गया। एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने तो प्रदेश के बाहर के समाचार पत्रों में लाखों रुपये का विज्ञापन लेकर अपना सिस्टम फिट कर लिया, बात यही नही खत्म होती, राजनीतिक दलों में अपनी अपनी धाक दिखाते हुए तीज त्योहार पर जो अनमोल तोहफे पत्रकारो के नाम पर लिए जाते है उनकी यहां कोई गिनती ही नही, पत्रकारो पर जब कोई संकट या मुसीबत आती है या किसी सरकारी अधिकारी द्वारा पत्रकार का उत्पीड़न किया जाता है तो पत्रकार के साथ समिति के एक आध पदाधिकारी को छोड़ दिया जाए तो कोई भी वरिष्ठ पदाधिकारी कभी भी किसी भी मौके पर नही दिखाई देता है। उल्ट अधिकरियों के समकक्ष सबकुछ मैनेज करते हुए देखा जा सकता है, और अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं।

हमारा यही चयनित पदाधिकारी…..बात यही नहीं खत्म होती बेचारे पत्रकार उत्पीड़न पर, मान्यता समिति के पदाधिकारी उस पत्रकार को किसी न किसी गुट का बता कर अपना पल्ला झाड़ लेते है, लेकिन मौका गमी का हो तो अलग अलग शोक सभा का आयोजन करने से नही चूकते, स्वर्गवासी पत्रकार की शान में अलग अलग गुट अनेक घोषणाएं तक कर देते है और वो आसमान से टकटकी लगाए इन घोषणाओं को पूरा होने की उम्मीद में ही रह जाता है। जब तक मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के चुनाव में दो गुट में बटी फेडरेशन की दखलंदाजी रहेगी, पत्रकारो की चयनित संस्था भी दो गुट में बटी रहेगी। अभी वक्त है, चुनाव से पहले बुद्धजीवियों की इस समिति के वरिष्ठ पदाधिकारियों को अपनी 2 साल की आमदनी का ब्यौरा सार्वजनिक करना चाहिए और चुनावी समर में आने वाले प्रत्याशियों को इस गुटबाजी से दूर रहने की शपथ भी लेनी चाहिए। क्योंकि आजतक मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के सदस्यों को न तो प्रेस क्लब की सदस्यता मिली और न हीं उनको वहां आधिकारिक रूप से प्रवेश मिलता है। जबकि इस प्रेस क्लब की राजनीति की आड़ में मान्यता समिति दो गुट में बट जाती है जो आम पत्रकारो के लिए नुकसानदेह है और आम पत्रकार इसी में फस कर रह जाता है। मैं किधर जाऊं यारों, तू उधर जाओं होता नहीं, ये फैसला एक तरफ मैकदा एक तरफ उसका घर। न तो प्रेस क्लब की सदस्यता मिलती है और न ही उसके हितों का कोई भी काम होता है और गुटबाजी के इस खेल में, पत्रकारों के नेता की दसों उंगली घी में और सर कढ़ाई में, अब वक्त आ रहा है चुनाव का तो नेता जी अपना सर कढ़ाई से निकाल चुके है और उँगलियों पर जमी घी की परतों को साफ करके महफिलों में हाथ जोड़े दिखाई देने लगे हैं, ऐसे में हम सभी पत्रकारों को ये तय करना होगा की 2020 में नेतृत्व की बागडौर फेडरेशन से जुड़े गुटों के हाथ मंे देकर मान्यता समिति को गुटबाजी का शिकार होने देना है या फेडेरेशन की दखलंदाजी को पत्रकारो की समिति से समाप्त करना है…गुटबाजी नही खत्म हुई तो आम पत्रकार का यही तराना रह जायेगा-
                                                        एक तरफ उसका घर, एक तरफ मैकदा,
                                                                मैं कहाँ जाऊं होता नही ये फैसला

क्रमशः…भाग 2 मेँ

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