उ.प्र.संवाददाता समिति के सचवि ने अध्यक्ष पर फोड़ा दीवाली बम

 

Naved Shikoh

दीपावली के खुशगवार मौके पर आज एक बेहद क्रिएटिव और दिलचस्प तंज लखनऊ के पत्रकारों के बीच दीवाली बस जैसी धमक पैदा कर गया। इसी के साथ ही इस ललकार को चंद माह पहले ही चुनावी तैयारियों की ललग़ार की तरह भी देखा जा रहा है। किस्सा ये है कि राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी इन दिनों आईएफडब्ल्यूजे के कार्यक्रम के लिए लंका नरेश लंकेश (रावण)के देश श्रीलंका मे हैं।

इधर मर्यादा पुरषोत्तम भगवान श्री रामचंद्र जी की नगरी अयोध्या में दीपावली के अवसर पर योगी सरकार का एतिहासिक दीपोत्सव का कार्यक्रम है। इस कार्यक्रम में जाते समय राज्य मुख्यालय मान्यता संवाददाता समिति के सचिव शिवशरण सिंह ने लिखा कि “आपको राम के यहां जाने वाला चाहिए या रावण के यहां जाने वाला” ! समिति के सचिव की इस पोस्ट को चुनावी रस्साकसी का आग़ाज माना जा रहा हैं। हांलाकि समिति के चुनाव चार महीने बाद होने हैं। इनके इस जुमले से ये भी अंदाजा लगाया जा रहा है कि हो सकता है कि सचिव शिवशरण अबकि बार अध्यक्ष पद के लिए ताल ठोकें।

पक्ष-विपक्ष, क्रिया-प्रतिक्रिया, तंज-व्यंग्य, सवाल उठाना-जवाब देना, सराहना-आलोचना, प्रतिस्पर्धा, प्रतिद्वंदीता.. ये सब लोकतांत्रिक व्यवस्था का सौंदर्य है। इसमें कोई बुराई नहीं। इसमें कोई हर्ज नहीं। लेकिन दिलचस्प बात ये हैं कि राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के भीतर ही दो धड़ों में पक्ष-विपक्ष जैसी प्रतिद्वंद्विता नजर आती है। अध्यक्ष और सचिव के बीच बेहतर सामंजस्य नहीं है, जिसके कारण दोनों मिलकर पत्रकारों के हित में ज्यादा काम नहीं कर पा रहे हैं। हांलाकि इन दोनों पदाधिकारियों ने अलग-अलग रहकर भी अपने-अपने स्तर से कुछ बेहतर काम किए हैं। पत्रकारों के किसी भी दो गुटों के बीच तकरार को कोई भी पत्रकार अब सीरियसली नहीं लेता है। और ना ही किसी पत्रकार नेता/गुटर्न/संगठन से कोई अपना नाम जोड़ना चाहता है।

तमाम संगठनों की तकरारों को हास्य-विनोद तक ही सीमित हैं, दो गुटों/ दो संगठनो या दो पत्रकार नेताओं के बीच टकराव को अब मजाक में गैंग वार कहा जाने लगा है। लेकिन इसे गंभीरत से कोई नहीं लेता। समझदार पत्रकार इसे निजी स्वार्थ की लड़ाई मानकर इनके चक्कर में नहीं पड़ना चाहते हैं। अपवाद स्वरूप दोनों तरफ से लगभग पांच-सात, पांच-सात कहारों को छोड़ दीजिए तो 99 प्रतिशत पत्रकार किसी गुट में किसी का समर्थक नहीं बनना चाहता। पांच-सात इधर और पांच सात उधर को छोड़ दीजिए तो सब प्रतिस्पर्धा के तमाशे को इंज्वॉय करते हैं। पत्रकारों से संबधित किसी भी खुशी और ग़म के कार्यक्रम में हर कोई हर कहीं शिरकत करता है। शोक सभा हो, सम्मेलन हो या कोई भी गेट टू गेदर हो, जहां जिसे भी सम्मान से बुलाया जाता है वो स्वेच्छा और स्वतंत्रता से ज्यादा है। काश इस दीपावली में इन चंद कहारों/समर्थकों के दिमाग में सद्बुध्दि के चिराग रौशन हों। और कोई इन्हें अपने स्वार्थ की लड़ाई में  इस्तेमाल ना कर सके ।

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