कारसेवकों की भीड़ में गायब हुई राम की मूर्ति !

कारसेवकों की भीड़ में गायब हुई राम की मूर्ति
6 दिसंबर 1992 को जब अयोध्या में विवादित ढांचा गिराया गया, मैं अयोध्या के विवादित परिसर में ही था। उस वक्त मैं ‘राष्ट्रीय सहारा’अखबार में हुआ करता था और अपने अख़बार के लिए अयोध्या के घटनाक्रम की कवरेज के वास्ते अयोध्या में था। 6 दिसंबर को जिस वक्त कार्यसेवक विवादित ढांचे पर चढ़ रहे थे, उन्हें मैंने अपने कैमरे में कैद किया था। जब मैं ये कर रहा था, उसी दरमियान कारसेवकों की नजर मुझ पर गई। फिर क्या था, भीड़ का एक हुजूम मुझ पर टूट पड़ा। गालियों की बौछार थी और लात-घूंसों का प्रहार था। मेरा कैमरा मुझसे छीनकर तोड़ डाला गया। बैग भी मुझसे छीन लिया गया। पिटाई में मेरा जबड़ा टूट चुका था। कोई आधे घंटे बाद मैं थोड़ा-बहुत सामान्य होने की स्थिति में आया।
पिटने और लुटने के बाद जेहन में पहला सवाल यही आया कि अब क्या करूं/ यहां से बाहर निकलूं या यहीं रुकूं/ मैंने ठान लिया कि अब इसी परिसर में मौजूद रहकर जो कुछ भी हो रहा है, उसे देखना है। अपने इस फैसले के चलते मैं मंदिर के गर्भगृह की तरफ पहुंचा तो देखा कि भगवान की मूर्तियां वहां से गायब हैं। पूरा गर्भगृह खाली हो गया था। मंदिर की दीवार पर लगी घड़ी जमीन पर टूटी पड़ी थी। पूजा की सामग्री भी जमीन पर बिखरी थी। मुख्य पुजारी जयश्री राम के नारे लगा रहे थे।
यह जानकारी जब बाबा रामचंद्र परमहंस को हुई तो उन्होंने अपने एक चेले को राजा अयोध्या के यहां से भगवान राम की मूर्ति लाने के लिए भेजा और भगवान राम का अस्थायी मंदिर बनाने के लिए कारसेवकों के साथ जुट गए। राजा अयोध्या से जब भी बात हुई वह यही बताते कि जो मूर्ति उन्होंने बाबा के शिष्य को दी थी, आज उसी मूर्ति की पूजा हो रही है। राजा अयोध्या राममंदिर में राम की मूर्तियों के बार-बार बदले जाने की भी कहानी बताते हैं। कहते हैं कि मंदिर पर बार-बार हमले हुए, हर बार मूर्ति बदली। छह दिसंबर को जो मूर्ति गायब हुई वह 1949 को 22 दिसंबर की आधी रात वहां रखी गई थी। चार सौ साल पहले जब मीर बाकी ने मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई तो उस वक्त की विक्रमादित्य द्वारा स्थापित मूर्ति टीकमगढ़ के ओरछा राजमहल में चली गई। ओरछा की महारानी अयोध्या आकर वह मूर्ति ले गई थी। ओरछा के मंदिर में वह मूर्ति आज भी है।
एक ही तांगे से जाते थे हाशिम-परमहंस :
मुस्लिम पक्ष की ओर से इस विवाद में चाहे जितने नामी-गिरामी चेहरे हों या रहे हों लेकिन अयोध्या के हाशिम अंसारी मुस्लिम पक्ष के प्रतीक बन चुके थे। वह 1950 से इस मुकदमे के मुद्दई थे। यह जानना और भी दिलचस्प है कि इस मुद्दे पर चाहे जितना भी खून बहा हो लेकिन हाशिम अंसारी और रामचंद्र परमहंस दास की दोस्ती जीवन भर अटूट रही। मुकदमे की तारीख पर भी दोनों एक साथ एक ही तांगे पर बैठकर कचहरी जाते थे। 90 से 92 के दरम्यान अयोध्या में बहुत कुछ हुआ लेकिन हाशिम अंसारी के घर पर किसी ने एक कंकड़ भी नहीं फेंका। वह इसे अयोध्या के सद्भाव का प्रतीक मानते थे। वहां जो भी खून-खराबा हुआ, उसके लिए बाहरी भीड़ को जिम्मेदार बताते थे। मैं हाशिम अंसारी से पहली बार 1990 में मिला था। उसके बाद से जब भी अयोध्या गया, उनसे मुलाकात होती रही। हर मुलाकात में वह विल्स सिगरेट का कश खींचते हुए इस पूरे विवाद की पर्दे के पीछे की कोई न कोई कहानी जरूर सुनाते थे। कहते थे, ‘सियासी नेताओं के जो चेहरे पब्लिक देखती है, उन चेहरों के पीछे भी तमाम चेहरे होते हैं। पब्लिक में कुछ और दिखते हैं, बंद कमरे में जब उनसे बात होती है, तब वे कुछ और होते हैं। नेताओं की वजह से ही यह मामला पेचीदा हुआ है।’ कई बार वह मुकदमेबाजी से उकता जाने की बात करते थे। हाशिम से जब मेरी आखिरी मुलाकात हुई तो उन्होंने कहा था, ‘अयोध्या के विवादित परिसर की सुरक्षा पर रोजाना लगने वाले 24-25 लाख रुपये अयोध्या के विकास में लग जाते तो यहां की तस्वीर और तकदीर दोनों बदल जाती। मुसलमान और हिंदू दोनों के आंगन में भरपूर रोशनी फैलती।’ हाशिम ने बताया था कि एक बार उन्होंने और परमहंस दोनों ने अदालत से बाहर इस विवाद का हल तलाशने की कोशिश की थी लेकिन वह परवान नहीं चढ़ी। 2016 में हाशिम अंसारी की मौत हो गई।
इतिहास बनते लोग :
अयोध्या में विवादित ढांचा ध्वंस हुए 27 साल गुजर गए। और अब अयोध्या विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने को है। वर्षों से चल रहे इस विवाद के इतिहास को देखें तो तमाम चेहरे बदल गए, सियासत के मुद्दे बदल गए। नेताओं के सुर बदल गए और खेमे भी। सियासी सरोकार बदल गए। अयोध्या भी बदल गई और यहां के लोग भी। कुछ को नियति ने छीन लिया तो किसी को राजनीति व समय ने पीछे धकेल दिया। तीखे तेवरों पर उम्र हावी हुई तो गरजने वाले स्वर कमजोर पड़ गए। आडवाणी और कल्याण सिंह सरीखे नेता जो दूसरों को सहारा देते थे, खुद सहारे के मोहताज हो गए। विनय कटियार जिन्हें उस वक्त फायर ब्रांड माना जाता था, नेपथ्य में चले गए या पीछे धकेल दिए गए। महंत रामचंद्र परमहंस मंदिर निर्माण और हाशिम अंसारी मस्जिद निर्माण का सपना लिए ही संसार से विदा हो गए। वीएचपी के कार्यकारी अध्यक्ष रहे अशोक सिंघल भी दुनिया छोड़ गए। मंदिर आंदोलन को आशीर्वाद और मार्गदर्शन देने वाले देवराहा बाबा और ‌विजयाराजे सिंधिया जैसी शख्सियतें भी नहीं रहीं। परदे के पीछे आंदोलन के सूत्रधारों में शामिल रहे नानाजी देशमुख भी मुद्दा सुलझने का इंतजार करते-करते ही चिरनिद्रा में सो गए। आंदोलन का एक तीखा स्वर और बाबरी मस्जिद के पक्ष में देश-विदेश के मंचों पर आक्रामक शैली में कानूनी और तकनीकी पक्ष रखने वाले सैय्यद शहाबुद्दीन भी 2017 में स्वर्गवासी हो गए। तोगड़िया भी वीएचपी से बाहर कर दिए गए। –

(श्री राजेन्द्र कुमार की फेसबुक  वॉल से )

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