चादर सहेज रख लेना

1970 में कलकत्ता जा रहा था। जो लोग मेरे सामाजिक जीवन को बोझ समझ रहे थे, उन्हें अहसास कराने का लक्ष्य लेकर। पिता जी ( स्वर्गीय श्री रमाशंकर लाल श्रीवास्तव ) दुखी थे कि अभी मैं हूँ, इसकी जरूरत नहीं। दुखी तो माँ ( श्रीमती सरस्वती देवी श्रीवास्तव ) भी थीं लेकिन उन्होंने अपने दुख को ललकार में बदल लिया। उस जमाने में मास्टरों की तनख्वाह बहुत कम थी लेकिन दोनों मास्टर थे, इसलिए काम आराम से चल रहा था लेकिन भैया ( श्री वीरेंद्र नाथ श्रीवास्तव जो इलाहाबाद बैंक में अफसर थे ) की एक व्यवहारिक सोच थी कि कायस्थ के लड़के को या पढ़ना चाहिए या नौकरी।

सो मैं स्टेशन आ गया, कलकत्ता जाने के लिए जनता एक्सप्रेस पकड़ने। घर स्टेशन के करीब था। इसलिए माँ भी आ गईं। साथ में मेरे पड़ोसी श्री सिपरसन भी थे जो हाथ में एक झोला लिए हुए थे।

माँ ने पचास रुपए के साथ वह झोला मेरे हवाले करवाया और सिर्फ इतना कहा, ” परदेश में काम आएगा ” । झोले में पिसा हुआ सत्तू था, गुड़, मिर्चे का अचार, नमक और प्याज भी।

आज चेकअप के लिए रवाना हो रहा हूँ। दिल्ली में कई दिन रहना पड़ेगा, सो कल से ही तैयारी चल रही है, पुत्र धीरज कुमार की देखरेख में। समान बंध चुका है। बेटी रचना बार बार समझा रही हैं, जो जहाँ जरूरत पड़ेगी खरीद लिया जाएगा। समान कम से कम रखिए। कुशाग्र प्रसन्न हैं कि हम लोग इस बार दीपावली में उन लोगो के साथ जोधपुर में रहेंगे। पकंज कुमार जी ( मेरे दामाद ) को बार बार यहाँ से ललकारा जा रहा है कि खर्च बढेगा, जेब अभी से मजबूत रखिए। इधर वहाँ के लिए नमकीन, ठेकुआ, टिकरी आदि बना रहीं हैं, बहू श्रीमती नैन्सी श्रीवास्तव। इस आदेश के साथ कि पापा ! इलाज में लापरवाही नहीं। लापरवाही के कारण ही मेरे पिता फालिज के शिकार हो गए थे जो उनकी मौत का कारण बना। इस हिदायत के साथ ही नमकीन परोसा गया, साथ में टिकरी भी। अच्छा लगा तो दोहरा दिया तो कोतवाल ने कहा कि बीमार हो, फिर भी नहीं मानते। पुत्र ने कहा कि कल आपके नाम पर जानवरों को खिलाने से अच्छा है, आप खाइए, जो अच्छा लगे, वह सब खाइए और पीजिए भी। कहें तो वह भी ( मेरी पसन्द की पासपोर्ट, टीचर्स, ब्लेक डाग ) लाऊँ।

कोतवाल ने बदपरहेजी के लिए फिर हड़काया। रसोईं से ठेकुआ की खुशबू आ रही थी। इस खुशबू के बीच ही माँ के उस सत्तू की याद आ गई जो उन्होंने कलकत्ता जाते समय दिया था। इसी में आमद हो गए सात शेर जो उन सभी मित्रों को अर्पित है जो एक दशक से बुझने की ओर अग्रसर इस दिए को जबरी जलाए हुए है।

चादर सहेज रख लेना

मिले जहाँ कोई आखर सहेज रख लेना।
भावना प्रेम की गागर सहेज रख लेना।

बचा जरा सा सफर शेष भी कट जाएगा,
मेरे धीरज ये आदर सहेज रख लेना।

बिना गुरेज जो इस धूप में भी हँसना है,
सिर्फ ईमान की चादर सहेज रख लेना।

बुरा लगे न तो साकी मैं एक अर्ज करूँ,
लौटना है मुझे सागर सहेज रख लेना।

बहुत से लोग मेरे साथ के पियासे हैं,
कहीं मिले तो कुछ बादर सहेज रख लेना।

कबीर पर नज़र टेढ़ी है इस जमाने की,
टोटका के लिए काजर सहेज रख लेना।

किसी भी हाल में हँसने को यह जरूरी है,
नाहरों मेरा जिगर घर सहेज रख लेना।

Post Source : Facebook Dhirendra Nath Srivastva

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