तुम जहां जहां चलोगे मेरा साया साथ होगा..

डॉ मोहम्मद कामरान

आज 6 अक्टूबर 2019 को जामा मस्जिद की सीढ़ीयों पर कदम रखते ही फिर गांधीजी याद आ गए, साल 2019 में हम गांधीजी की 150वीं जयंती मना रहे है और 100 वर्ष पूर्व 1919 में गांधीजी की हिन्दू मुस्लिम एकता की मुहिम को मजबूती देने के लिए जामा मस्जिद से बोलने वाले एक मात्र हिंदू नेता, स्वामी श्रद्धानंद ने इसी जामा मस्ज़िद के मंच से मुसलमानों को संबोधित किया था। मुस्लिम समुदाय के लोगों ने गोहत्या के विरोध में ऐलान किया था और मौलाना मोहम्मद अली ने साफ साफ बयान किया कि कलाम-ए-पाक हिंदू-मुस्लिम कौम में नफरत की बात नही करता बल्कि इत्तेहाद की इजाजत देता है। ये वही स्वामीजी थे जिन्होंने वर्ष 1915 में सार्वजनिक रूप से गांधीजी को महात्मा कहकर बुलाया था और फिर जालंधर में गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना स्वामीजी द्वारा की गई।

ये देश का दुर्भाग्य है कि गांधीजी की तरह स्वामीजी जी की हत्या भी एक सिरफिरे द्वारा गोली मारकर की गई, बस फर्क इतना है कि स्वामीजी के हत्यारों को देश के इतिहास ने हत्यारा ही माना वहीं गांधीजी के हत्यारे को इतिहास में जगह देकर उसे एक विचारधारा के रूप में विकसित किया गया।

किसी भी हत्यारे की विचारधारा हिंसक ही होती है, और आज 150वीं जयंती पर अहिंसा के इस पुजारी को असली और सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम सब देश मे पनपती इस हिंसात्मक विचारधारा को समाप्त करने में अपना योगदान करें,,, इंसान को तो मारा जा सकता है लेकिन देश की धड़कनों में बसने वाले गांधीजी की बातें और यादें हर जगह मौजूद है, फिर देश की राजधानी दिल्ली में तो ये आलम है कि जहाँ जहाँ जाओगे गांधीजी का ज़िक्र पाओगे,,,

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